इंस्पायरिंग:  सपने देखने की हिम्मत रखें, रास्ते लंबे हो सकते हैं लेकिन खुद बनते जाएंगे – इलॉन मस्क
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इंस्पायरिंग: सपने देखने की हिम्मत रखें, रास्ते लंबे हो सकते हैं लेकिन खुद बनते जाएंगे – इलॉन मस्क

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4 घंटे पहले

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हाल ही में दुनिया के पहले ट्रिलिनेयर बन गए हैं। कैसे उनका सफर शुरू हुआ, कैसे उन्होंने खुद में छुपी ताकत को जाना, उन्हीं की जुबानी… जब मैं लगभग छह साल का था, तब महसूस किया कि अगर आपको किसी चीज की सच में चाह है, तो आप उसके लिए दूर तक जा सकते हैं। मुझे याद है, किसी वजह से मुझे घर में सजा मिली थी। ठीक से याद नहीं कि वजह क्या थी, लेकिन पूरा विश्वास था कि मेरे साथ अन्याय हुआ है। उसी दौरान मेरे पांच साल के चचेरे भाई की जन्मदिन पार्टी थी और मैं वहां जाना चाहता था। पहले सोचा साइकिल से चला जाऊंगा। मैंने मां को यह बात बताई, जो शायद मेरी गलती थी। उन्होंने समझाया कि साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस चाहिए और पुलिस मुझे रोक लेगी। मैंने तय किया कि पैदल निकलता हूं। मुझे लगा रास्ता पता है, लेकिन वह शहर के दूसरे छोर पर था। फिर भी मैं चलता रहा। करीब चार घंटे बाद, जब मां मेरे भाई-बहनों के साथ पार्टी से वापस लौट रही थीं, उन्होंने मुझे सड़क पर चलते देखा। वह घबरा गईं। मैंने देखा कि उन्होंने मुझे देख लिया है, तो मैं तेजी से दौड़कर अपने चचेरे भाई के घर पहुंचा, एक पेड़ पर चढ़ गया और नीचे उतरने से मना कर दिया। बचपन से ही मेरे अंदर एक बात थी कि अगर मुझे किसी लक्ष्य तक पहुंचना है, तो मैं कोशिश जरूर करूंगा, चाहे रास्ता लंबा क्यों न हो। जब मैं दस साल का था, दक्षिण अफ्रीका में एक कंप्यूटर स्टोर में गया। वहीं पहली बार असली कंप्यूटर देखा। इससे पहले मेरे पास अटारी सिस्टम जैसा शुरुआती गेमिंग कंसोल था। लेकिन उस दिन मैंने कुछ ऐसा देखा जिसने मेरी दुनिया बदल दी। वह था कमोडोर वीआईसी-20 कंप्यूटर। इसमें आप खुद गेम बना सकते थे। मेरे लिए यह किसी जादू से कम नहीं था। मैंने प्रोग्रामिंग सीखने की किताबें खरीदीं और खुद ही कोडिंग सीखना शुरू कर दी। यह इतना रोमांचक था कि मैंने गेम बनाकर पैसे कमाने की कोशिश की, ताकि और गेम खरीद सकूं। बेहतर गेम के लिए बेहतर कंप्यूटर चाहिए था। इस तरह सीखने, बनाने और आगे बढ़ने का एक चक्र शुरू हुआ। उस समय एहसास नहीं था कि वही जिज्ञासा आगे चलकर मेरी जिंदगी की दिशा तय करने वाली थी। लगभग 12 से 15 साल की उम्र के बीच मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि जीवन का अर्थ क्या है? हम यहां क्यों हैं? यह सब किसलिए है? मैंने कई किताबें पढ़ीं। संयोग से हमारे घर में नीत्शे और शोपेनऑवर की किताबें थीं। 14 साल की उम्र में उन लेखकों को पढ़ना शायद अच्छी बात नहीं थी। उनके विचार गंभीर और कई बार निराशावादी थे। उन्हें पढ़कर दुनिया और उलझी हुई लगी। फिर मैंने ‘हिचहाइकर गाइड टु द गैलेक्सी’ पढ़ी। उस किताब ने मेरे सोचने का तरीका बदला। मैंने सीखा कि सही सवाल पूछना, जवाब खोजने से ज्यादा कठिन होता है। सवाल को सही ढंग से समझें, तो जवाब तक पहुंचना आसान है। यहीं से मैंने सोचना शुरू किया कि अगर हम ब्रह्मांड को बेहतर ढंग से समझ सकें, ज्ञान और चेतना का विस्तार कर सकें, तो उन सवालों के करीब पहुंच सकते हैं जो वास्तव में मायने रखते हैं। शायद जीवन का अर्थ खोजने का रास्ता भी वहीं से गुजरता है। आपका लक्ष्य बड़ा है, तो रुकावटें आएंगी लक्ष्य बड़ा है, तो रास्ते में रुकावट आना तय है। लेकिन रुकें नहीं। दूसरा रास्ता ढूंढें। दुनिया बदलने की शुरुआत सिर्फ एक जिज्ञासु बच्चे से होती है, जो यह पूछने की हिम्मत कर सकता है कि – क्या इसे और बेहतर बनाया जा सकता है? (तमाम इंटरव्यू में)



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