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- N Raghuraman Column | School Teacher Life Lesson & Student Experience
55 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
किसी स्कूली छात्र से पूछिए कि उसे कैसा लगता है, जब उसका नाम पब्लिक एड्रेस (पीए) सिस्टम पर लिया जाता है और उसे ऑफिस में बुलाया जाता है। उन चंद मिनटों में उसकी धड़कन को मापें। यकीन मानिए, कार का स्पीडोमीटर भी उसकी रफ्तार नहीं माप सकता।
जब मैं स्कूल में था, तब पीए सिस्टम नहीं होते थे। एक प्यून क्लासरूम के दरवाजे पर आकर जोर से कहता, ‘मैडम, प्रिंसिपल सर रघु को बुला रहे हैं।’ इतना ही काफी था। जैसे ही पूरी क्लास ने नाम सुना, अलग-अलग ग्रुप अपनी-अपनी थ्योरी बनाने लगते।
कोई नहीं सोचता कि रघु की धड़कन किस रफ्तार से चल रही होगी। अलग-अलग टीचर अलग-अलग तरीके से रिएक्ट करते। कोई पूछता, ‘क्या हुआ रघु? तुमने ऐसा क्या किया कि प्रिंसिपल बुला रहे हैं?’ ये शब्द ही धड़कन को हर स्पीड लिमिट के पार पहुंचा सकते थे। फिर हमारी एक ललिता टीचर थीं, जो हिस्ट्री पढ़ाती थीं।
वह बस प्यून से कहतीं कि ‘मैं इसे दो मिनट में भेज दूंगी।’ प्यून के जाते ही वह रघु को बुलाकर कहतीं कि ‘ऑफिस जाओ और कुछ चॉक ले आओ। वहां यह भी पता कर लेना कि तुम्हें क्यों बुलाया है।’ चूंकि एक टास्क पूरा करना होता था तो धड़कन थोड़ी मंद पड़ जाती।
ललिता टीचर से मैंने सीखा कि किसी को सहज करके तूफान का सामना करने के लिए कैसे तैयार किया जाए, अगर वाकई कोई तूफान हो तो। फिर एक दिन प्रिंसिपल नागराजन खुद हमारी क्लास में आए। हम डर के मारे खड़े हो गए। वह चुपचाप क्लास में घूमे और एक लड़के को छोड़कर सभी से बात की, जिसका नाम मैं यहां नहीं बताना चाहूंगा।
वे उस लड़के के कंधे पर हाथ रख कर बोले कि ‘मेरे साथ चलो’ और कंधे पर हाथ टिकाए ही बाहर निकल गए। क्लास में सभी की आंखों में हैरानी थी। वह क्लास के सबसे मेधावी और अच्छे व्यवहार वाले छात्रों में से एक था। वह कभी ऐसा लड़का नहीं रहा, जिसे प्रिंसिपल रूम में बुलाया जाता हो।
हम तुरंत फुसफुसाने लगे कि उसने ऐसा क्या कर दिया होगा कि प्रिंसिपल खुद उसे लेने आए। बहुत बाद में हमें पता चला कि सिर्फ 30 मिनट पहले उस लड़के ने अपने एक परिजन को खो दिया था और उसके परिवार से कोई उसे घर ले जाने आया था। नागराजन सर से मैंने सीखा कि अथॉरिटी तभी मायने रखती है, जब उसके साथ संवेदना हो। फिर एक पंडित सर थे, जो हमें तमिल पढ़ाते थे।
वह हमेशा सफेद शर्ट और ट्राउजर पहनते थे। जिन पांच साल में मैं उन्हें जानता था, उनमें उन्होंने अपने कपड़ों का रंग कभी नहीं बदला। एक दिन कुछ छात्रों ने पंडित सर को मेन रोड पर अपने आगे चलते देखा। उनमें से एक ने चुपके से उनकी पीठ पर स्याही छिड़की और गायब हो गया।
अगले दिन पंडित सर ने उन्हें अपनी डेस्क के पास बुलाया। उन्होंने पूरी क्लास से कहा कि ‘मैं जानता हूं कि कल मेरी शर्ट पर किसने स्याही छिड़की थी। लेकिन मैं तुम्हें महान तमिल कवि तिरुवल्लुवर का एक दोहा सुनाता हूं।’ उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति आपके साथ बुरा करता है, उसके साथ अच्छाई से पेश आना ही उसके लिए सबसे अच्छी सजा है। इससे उसे अपनी गलती का एहसास होता है और आप बदला लेने के वजन से मुक्त हो जाते हो। पंडित सर से मैंने क्षमाशीलता की ताकत सीखी।
फंडा यह है कि कुछ शिक्षक अपने आप में ही संस्थान होते हैं। इन तीनों शिक्षकों में से आज कोई जीवित नहीं है। लेकिन इतने वर्षों बाद भी उन्हें याद किया जाता है- सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्होंने हमें सब्जेक्ट पढ़ाए, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने कामों के जरिए हमें सिखाया कि बेहतर इंसान कैसे बना जाए।








