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एन. रघुरामन का कॉलम: शांतिपूर्ण ट्रेन यात्रा हमारा सामूहिक अधिकार है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

दशकों तक ट्रेन का सफर यादों में ले जाने वाली एक धीमी और जादुई यात्रा हुआ करता था। हममें से ज्यादातर लोगों के मन में इसकी एक अनमोल तस्वीर बसी हुई है- खिड़की के पास बैठना, हाथ में पसंदीदा कॉमिक बुक कसकर पकड़ना और मां का घर में बना खाना हमें प्यार से खिलाना, इस सावधानी के साथ कि हम उंगलियां गंदी न कर लें।

हम घंटों तक बाहर देखते रहते थे। जहां तक हमारी आंखें देख पातीं, वहां तक विशाल पहाड़ और अंतहीन हरियाली हमें मंत्रमुग्ध कर देती। उस दौर में दुनिया एक खूबसूरत, संगठित रिदम में चलती थी। लोहे की पटरियों पर एक सतत और आराम देने वाली खड़खड़ाहट होती थी, जैसे कोई तेज, लयबद्ध धड़कन हो। बाद में जब सील्ड एसी कोच आए तो यही आवाज शांत और मधुर हो गई।

यह शांत और अजूबों भरी ऐसी साझा जगह थी, जहां यात्री दिन में सपने देख सकते थे, पढ़ सकते थे या बस गुजरते नजारों में खोए रह सकते थे। लेकिन आज यह शांत माहौल स्मार्टफोन स्पीकरों की तेज आवाज, ऊंची आवाज वाले फोन कॉल्स और अनम्यूटेड वीडियो की आवाजों से बिखरता जा रहा है।

खासकर आधुनिक, सील्ड एयर-कंडीशंड कोच और वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेनों में यह समस्या गंभीर हो चुकी है। चूंकि इन कोचों को पटरियों की आवाज रोकने के लिए अच्छे-से इंसुलेट किया जाता है, इसलिए इनके भीतर का माहौल पारंपरिक स्लीपर क्लास के मुकाबले काफी शांत होता है।

विडंबना यह है कि इसी शांति के कारण हर डिजिटल रिंगटोन, सोशल मीडिया रील और बच्चों के कार्टून की तेज आवाज अत्यधिक खलने लगती है- खासकर जब रात के सफर में यात्री सोने की कोशिश करते हैं।

आजकल एक ही कोच में कई लोगों द्वारा मोबाइल को स्पीकर पर चलाना आम हो गया है। दूसरी ओर, रेलवे नेटवर्क में बड़े बदलाव होने वाले हैं। कृषि में गिरावट के साथ धीरे-धीरे श्रमिक ग्रामीण इलाकों से एक एकीकृत श्रम बाजार की ओर माइग्रेट करेंगे।

ऐसे में 2030 तक शहरी आबादी मौजूदा लगभग 30 करोड़ से बढ़कर 59 करोड़ होने का अनुमान है। वर्किंग-एज पॉपुलेशन में 27 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी होगी और 70% नए रोजगार शहरों में पैदा होंगे। चूंकि इन शहरों में मकान महंगे हैं, इसलिए बहुत से लोग रोजाना उन हाई-स्पीड इंटरसिटी ट्रेनों से सफर करेंगे, जिन्हें रेलवे धीरे-धीरे शुरू कर रहा है।

2030 तक मध्यमवर्गीय परिवार लगभग 9.5 करोड़ से बढ़कर 16 करोड़ तक पहुंच सकते हैं। भारत में दस लाख या इससे अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या बढ़कर 68 होने का अनुमान है, जबकि पूरे यूरोप में ऐसे शहरों की संख्या 35 है।

ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों की कुल संख्या भी 2008 के 283.5 करोड़ से बढ़कर अगले साल 718.9 करोड़ हो जाएगी। इसीलिए, इस सामूहिक शांति को बचाने के लिए भारत समेत दुनिया भर के रेलवे नेटवर्क एंटी-नॉइज नियम लागू कर रहे हैं।

अमेरिका की एमट्रैक और जर्मनी की आईसीई ट्रेनों में लाइब्रेरी जैसे क्वाइट कोच होते हैं, जहां सख्त नियम लागू हैं। वहीं, जापान की शिंकान्सेन में डिफॉल्ट रूप से पूरी ट्रेन को शांत क्षेत्र माना जाता है, जहां ध्वनि शिष्टाचार अब लीगल स्टैंडर्ड बनता जा रहा है।

इस वैश्विक चलन का अनुसरण करते हुए भारतीय रेलवे ने जन विश्वास एक्ट के तहत नई सख्त पेनल्टी लागू की हैं। स्पीकर मोड पर म्यूजिक या वीडियो चलाने वाले, बच्चों को बिना हेडफोन के तेज आवाज में कार्टून दिखाने वाले या रात में ऊंची आवाज में कॉल करने वाले यात्रियों पर मौके पर ही 1000 रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है और उन्हें ट्रेन से उतारा जा सकता है।

लगातार नियमों की अनदेखी पर 5000 रुपए तक का जुर्माना और छह माह कारावास हो सकता है। दुनिया भर में यात्री ध्वनि शिष्टाचार को सिविक ड्यूटी मानते हैं। चूंकि जापान की तरह हमारे यहां किसी ट्रेन में डिफॉल्ट क्वाइट प्रोटोकॉल नहीं है, इसलिए हम हेडफोन तो पहन ही सकते हैं और आवाज धीमी रख सकते हैं, ताकि दूसरों के लिए ट्रेन का सफर शांतिपूर्ण और खूबसूरत बना रहे।

फंडा यह है कि दुनिया भर के रेलवे नेटवर्क स्मार्टफोनों की तेज आवाज की बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारतीय रेल यात्री के तौर पर हम रेलयात्रा की शांति वापस लौटाने के लिए कम से कम कोई प्रयास या एक्सपेरिमेंट तो कर ही सकते हैं। हमारे देश में बहुत-से लोगों के लिए यह लाइफटाइम एक्सपीरियंस हो सकता है।

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