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दिन के कितने घंटों को प्रोडक्टिव बनाया जा सकता है? सवाल को बचकाना मान कर और यह कहते हुए खारिज मत करिए कि ‘कोई चाहे तो पूरे 24 घंटों को भी प्रोडक्टिव बना सकता है।’ यह जवाब 1995 तक सही था। 2026 में सही जवाब है- करीब 20 घंटे 45 मिनट। सोच रहे कि कैसे? क्योंकि भारत में एक व्यक्ति औसतन 2.5 से 3.14 घंटे मोबाइल पर बिताता है। सोशल मीडिया पर सबसे कम औसत समय जापान में रोजाना सिर्फ 46 मिनट है। फिर दक्षिण कोरिया में 1.14 घंटे और तीसरे स्थान पर ऑस्ट्रिया में 1.32 घंटे है। अगर आप उनमें से हैं, जो जापानियों से ज्यादा समय मोबाइल पर बिताते हैं तो आपको यह जादू सीखना चाहिए। यह जादू सीखने के लिए आपको महज एक उपकरण चाहिए- कूड़ेदान। आपको कुछ नया खरीदने की जरूरत भी नहीं। आपको बताऊं कि यह आपके पास पहले से है और इसे रोजाना हर जगह साथ ले जाते हैं। सोच रहे हैं कि यह नई बात क्या है? तो बताता हूं कि हम सब अपने मोबाइल में एक ‘रबिश बिन’ आइकन लेकर चलते हैं। मैं उसी की बात कर रहा हूं और आश्वस्त भी हूं कि ज्यादातर लोग इसका बेहतर इस्तेमाल नहीं करते। जब आपके पास यह इक्विपमेंट है तो आपको जादूगर से मिलवाता हूं। वे यूके में रहने वाली एंटोनिया होयल हैं, जो बेहतरीन और निडर फीचर राइटर हैं। वह कभी युद्धग्रस्त यूक्रेन में बच्चे को जन्म देने की अकल्पनीय पीड़ा से गुजरी महिलाओं से मिलती हैं तो कभी उन चैटबॉट्स की परेशान करने वाली सच्चाई की पड़ताल करती हैं, जो युवाओं को ईटिंग डिसऑर्डर छुपाने के तरीके सुझाते हैं। हाल ही में वे अपना ‘5:2 डाइट’ डाइट प्रोग्राम लेकर आई हैं। मैंने पिछले चार हफ्ते इसे आजमाया और इसने हैरतअंगेज तरीके से मेरे वीकेंड के दिन लंबे बना दिए। सोशल मीडिया पर मेरा औसत समय घटकर करीब एक घंटे रोज रह गया। वह यह नहीं कहतीं कि आप सोशल मीडिया एप्स का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दें। उनकी सलाह है कि शुक्रवार शाम सभी सोशल मीडिया एप्स डिलीट कर दें और सोमवार को ऑफिस जाते वक्त यात्रा में उन्हें फिर इन्स्टॉल करें। सोशल मीडिया के बिना वीकेंड बिताने की सलाह के समर्थन में वह वैज्ञानिक शोध का जिक्र करती हैं। वह ‘कम्प्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर’ जर्नल में प्रकाशित प्रतिभागियों के एमआरआई स्कैन ट्रायल का हवाला देती हैं। इसके नतीजे बताते हैं कि 72 घंटे तक सोशल मीडिया समेत स्मार्टफोन का सीमित इस्तेमाल फोकस को बेहतर और दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को रीसेट कर सकता है। अध्ययन के लेखकों में से एक और हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में जनरल साइकायट्री विभाग के डिप्टी डायरेक्टर रॉबर्ट क्रिश्चियन वोल्ड का कहना है कि ‘हमारा अध्ययन बताता है कि स्मार्टफोन से छोटा-सा ब्रेक भी दिमागी गतिविधियों में बदलाव ला सकता है, खासकर उन हिस्सों में जो सेल्फ कंट्रोल से जुड़े हैं।’ उनका दावा है कि अगर आप 16 हफ्तों तक शुक्रवार को एप्स डिलीट करने और सोमवार को फिर इन्स्टॉल करने की ‘5:2 डाइट’ अपनाते हैं तो आप सोशल मीडिया से मुक्त हो जाएंगे। जिन चार हफ्तों में मैंने ऐसा किया, मुझे लगा कि वीकेंड लंबे हो गए। मैंने हर हफ्ते एक पूरी किताब पढ़ी। अगर आप मुझे नियमित पढ़ते हैं तो देखा होगा कि बीते हफ्तों में मैं ऐसी किताबों का जिक्र कर रहा हूं, जो अभी रिलीज भी नहीं हुई हैं। मैंने अपनी
सारी टु-डु लिस्ट निपटा ली। मुझे इस बात की कम परवाह होने लगी है कि लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं। और अंतत: मुझे पता चला कि वीकेंड पर एप्स डिलीट करके मैंने कुछ भी मिस नहीं किया। चार हफ्तों बाद मुझे लगा कि इन ऐप्स के बिना रहने का मुझे कोई अफसोस नहीं है। फंडा यह है कि अगर आप सोशल मीडिया की परेशानियों से जूझ रहे हैं तो एक्सपर्ट्स की बताई ‘5:2 डाइट’ को आजमाइए। देखिए कि कैसे आपका वीकेंड न सिर्फ लंबा, बल्कि ज्यादा प्रोडक्टिव भी बनता है।
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