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- Navneet Gurjar Column | Emotional Poem On Woman Struggle & Resilience
6 घंटे पहले
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नवनीत गुर्जर
एक सुंदर कविता है-
वो रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी जैसे ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़ जैसे भूचाल बेलते हैं घर सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समंदर। रोज सुबह सूरज में एक नई उचकन लगाकर एक नई धाह फेंककर। वो रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी। पृथ्वी जो खुद लोई है, सूरज के हाथों में रख दी गई है पूरी की पूरी सामने कि लो, इसे बेलो, पकाओ जैसे मधुमक्खियां पकाती हैं शहद अपने पंखों की छांह में…। तब भी, जब सारा शहर सो चुका हो! धुल चुके हों सारे बरतन बुझ चुकी हो आखिरी चूल्हे की राख भी …और वो? अपने ही वजूद की आंच के आगे औचक हड़बड़ी में, खुद को ही सानती खुद को ही गूंधती बार-बार खुश है कि रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी…!
महिलाएं आज बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। हर क्षेत्र में। उनमें भी जिन्हें पुरुष कभी अपना एकाधिकार या आधिपत्य मानते थे! लेकिन जमाना इन महिलाओं की राह में आज भी रोड़ा बना हुआ है। इसी महीने दिल्ली में एक किशोरी के साथ गैंगरेप, एक और किशोरी की हत्या और जमुई में युवती के साथ छेड़छाड़ तथा मारपीट वाली घटनाएं हाड़ कंपा देने वाली हैं।
एक बच्ची पर अत्याचार और यह अत्याचार करते वक्त उसकी चीख सुनकर पसीजना, भागना तो दूर, ऊपर से चीखों का वीडियो बनाते रहना! इस तरह की वैमनस्यता आखिर कहां से और कैसे आती होगी? सही है- पूरा पुरुष समाज ऐसा नहीं है।
केवल कुछ नरभक्षी, आततायी ही यह सब कर रहे हैं। उन्हें किसी समाज, किसी सरकार का खौफ नहीं। किसी दण्ड का भय नहीं। जंगल के चीतों से भी जालिम हैं ये। जमाने भर से तेज हैं नाखून इनके। इनकी ये शैतानी भूख आखिर कब मिटेगी?
जाने कितने दिन और कितनी रातें निगल जाएंगे ये इसी तरह! कभी कोई तो ये समझे, कि महिलाएं आज अपनी हरियाली को खुद ही अपने लहू से सींच रही हैं।
किसी बाहरी हवा और किसी तरह की बारिश का जरा-सा भी कर्ज नहीं है उन पर। वे जब चाहें खिल सकती हैं। जब चाहें बड़ी, बहुत बड़ी हो सकती हैं। लेकिन क्या करें! उनकी शारीरिक संरचना ही ऐसी है कि भीतर एक पतली, सुंदर बेल पल रही होती है। यह बेल जब कभी बहुत तेज आंधी हो, किसी मजबूत पेड़ से लिपटना चाहती है।
सिवाय इसके वो हर तरह से मजबूत है। निडर है। बेखौफ भी। माना कि वो हिरनी हैं जन्म से ही। मगर अब शेरनी बनना चाहती हैं। तो बनने दो।
इन आततायी पुरुषों को आखिर हर्ज ही क्या है? दरअसल महिलाओं पर अत्याचार के लिए केवल सरकार जिम्मेदार नहीं है। सरकार अगर सख्त से सख्त कानून बनाए तो कुछ हद तक यह सब सीमित हो सकता है, लेकिन सरकारें तो चाहे जिस दल या पार्टी की हों, उनका स्वभाव एक जैसा ही होता है।
चुनाव-जिताऊ घोषणाओं को राज्य या देश के प्रति कर्तव्य बताकर राज करना ही उनका उद्देश्य रहा है। खैर, हर जगह, नुक्कड़ और गांव-गली में सरकार तो नहीं हो सकती, लेकिन उस समाज का क्या किया जाए, जो इस तरह की घटनाओं पर अपने होंठ सी लेता है, जैसे होंठ न हुए, जेल के बंद दरवाजे हों।
सबसे पहले हमारे समाज को संभलना, समझना होगा, जो अभी भी कई दर्द भरी चीखें सुनकर जाग नहीं पाता या नींद में गाफिल होने का प्रहसन करता रहता है! समझना होगा कि वो अपने बच्चों को शुरू से ही महिलाओं या अन्य किसी के भी सम्मान की शिक्षा किस तरह दे।
किस तरह उन्हें सत का मार्ग दिखाए। गलत रास्तों पर जाने से रोके! हमें समझना होगा कि बेशक, पत्थरों को हथौड़े से कूटने पर किसी तरह का खून नहीं बहता लेकिन दर्द तो उन्हें भी होता ही होगा! फिर हम सब तो मनुष्य हैं।
कितना दर्द होना चाहिए। क्यों नहीं होता? आखिर ये आततायी पुरुष क्या खाकर बड़े हुए होंगे, इनके भीतर निर्दयता का आखिर कितना बड़ा भंडार इकट्ठा है, जो आज के युग में भी महिलाओं, स्त्रियों, बच्चियों को चीज समझ रहे हैं? उन पर अत्याचार कर रहे हैं। उन्हें लूट रहे हैं! आखिर क्यों? क्यों?… और क्यों?
उस समाज का क्या करें? हर जगह, नुक्कड़ और गांव-गली में सरकार तो नहीं हो सकती, लेकिन उस समाज का क्या किया जाए, जो इस तरह की घटनाओं पर अपने होंठ सी लेता है, जैसे होंठ न हुए, जेल के बंद दरवाजे हों। सबसे पहले हमारे समाज को संभलना, समझना होगा, जो अभी भी कई दर्द भरी चीखें सुनकर जाग नहीं पाता या नींद में गाफिल होने का प्रहसन करता रहता है!








