नवनीत गुर्जर का कॉलम:  नए साल में नई शपथ, नए नियम
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: नए साल में नई शपथ, नए नियम

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2025 गया! 26 आ गया। अरदास यही है कि हमारे सभी कर्म सत्कर्म हों! ईश्वर कृपा करे कि इस बार पिछले साल जैसे हादसों का मुंह न देखना पड़े। हालांकि समय न किसी के लिए रुकता। न किसी के लिए चलता। उसकी अपनी चाल है। वर्षों से। युगों-युगों से। न वो कभी थका। न कभी बैठा। लेकिन, समय का 2025 नाम का जो अंग है, उसमें हादसों, दुर्घटनाओं के इतने गहरे और हरे घाव हैं कि लगता है अब ये समय भी बुढ़ा गया है। उसकी भी कनपटी के नीचे के बाल सफेद हो चले हैं। महाकुम्भ का आयोजन और उसके लिए जगह- जगह हुई दुर्घटनाएं हों या अहमदाबाद का विमान हादसा, आज भी जब याद आती है तो हड्डियां तक कंपकंपा जाती हैं। पूरे शरीर की एक-एक नस में सिहरन दौड़ जाती है। महाकुम्भ की बात करें तो 29 जनवरी 2025 की उस रात प्रयागराज में भीड़ इतनी अपार थी कि गंगा का पानी भी छोटा लग रहा था। सबसे पहले डुबकी लगाने की होड़ में ऐसी भगदड़ मची कि क्या बच्चे, क्या महिलाएं, सब कुचले गए। जो पहचाने गए उनकी संख्या 37 रही, लेकिन कई ऐसे भी थे, जिन्हें माता-पिता, भाई-बहन और बेटा-बेटी महीनों तलाशते रहे, कोई नहीं मिला। जाने उनके साथ क्या हुआ। क्या वे रेत में दब गए? क्या वे गंगा मैया में समा गए? कोई नहीं जानता। न लोग, न प्रशासन, न स्थानीय संस्थाएं! …और जहां तक सरकार का सवाल है, वह तो कुछ जानती ही नहीं। शायद जानना भी नहीं चाहती। इसी से जुड़ी एक घटना दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी हुई। तारीख थी- 15 फरवरी। भीड़ प्रबंधन में लापरवाही के कारण कुम्भ यात्रियों के बीच भगदड़ मच गई और कोई 18 लोग यहां भी मृत्यु का भोग बन गए। दूसरी बड़ी घटना थी- अहमदाबाद विमान हादसा। अहमदाबाद से लंदन जा रही एअर इंडिया की ड्रीमलाइन उड़ान टेकऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गई। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय भाई रूपाणी सहित कोई 260 लोग काल-कवलित हो गए। हालांकि जांच जारी है, लेकिन असल कारण अब तक पता न चला। भारत में क्रिकेट के बुखार से कौन परिचित नहीं है। जब से आईपीएल शुरू हुआ है, रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की पहली बार जीत हुई थी। 4 जून 2025 को इस जीत के जश्न में भी भीड़ के नियंत्रण के कोई उपाय नहीं किए गए या अनदेखी की गई। इतने लोग उमड़ पड़े कि एक-दूसरे को कुचल दिया गया। यहां भी कोई 11 लोगों की मौत हो गई। इस घटना से सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। लेकिन सुनता कौन है? प्रशासन मौन है और सरकारों ने तो जाने कब से अपने कान बेच खाए। उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाओं का तो मानो पारावार नहीं रहा। मनुष्य ने पहाड़ों को खोदा। नदियों को संकरा किया। उनके रास्तों में घर बांधे और फिर इस सबका दुष्परिणाम भी झेला। कहीं बादलों से बरसी आफत पूरी बस्ती बहा ले गई तो कहीं घरों को, मनुष्यों को डुबो दिया। 5 अगस्त को चमोली-पिथौरागढ़ में बाढ़-भूस्खलन के कारण 25 लोग मारे गए। अनियोजित विकास के खतरे बाढ़ के पानी की तरह उभर आए लेकिन कोई सावधानी, सावचेती नहीं। सरकारें अपने बचाव में कुतर्क गढ़ती रहीं और नेता जो मुंह में आया बोलते रहे। बादल फटते रहे। भूस्खलन होते रहे और लोग मरते रहे। 1 अप्रैल 2025 को गुजरात के डीसा में एक पटाखा फैक्टरी में विस्फोट हुआ और 21 मजदूरों की मौत हो गई। हादसे के बाद औद्योगिक सुरक्षा श्रम कानूनों को कड़ा करने की मांग उठी, लेकिन आखिरकार लीपापोती कर दी गई। उम्मीद यही की जा सकती है कि हम शपथ लें हमारी भूलों के कारण नए साल में कोई हादसा न हो और सरकारें इस तरह के हादसों की पुनरावृत्ति को रोकने के ईमानदार प्रयास करें। अनियोजित विकास के खतरे बाढ़ के पानी की तरह उभर आए लेकिन कोई सावधानी नहीं। सरकारें कुतर्क गढ़ती रहीं और नेता जो मुंह में आया बोलते रहे। उम्मीद की जा सकती है कि हमारी भूलों के कारण नए साल में कोई हादसा न हो।



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