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इन दिनों अपने बच्चों के लालन-पालन में कुछ अधिक ही अलर्ट माता-पिता उनसे अत्यधिक पूछताछ करते हैं और टोका-टाकी करते रहते हैं। इस चक्कर में वो भूल जाते हैं कि बच्चों के मनोविज्ञान पर विपरीत असर पड़ रहा है। कुछ माता-पिता तो भोजन के समय भी बच्चों को इतने अधिक विकल्प दे देते हैं कि बच्चे ‘डिसीजन फटीग’ में आ जाते हैं, यानी निर्णय लेने की क्षमता हिलने लगती है या वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। या तो बच्चे कह देते हैं या सोचते हैं कि क्या हम अपना निर्णय स्वयं नहीं ले सकते। और यहीं से माता-पिता की चुनौती शुरू हो जाती है। उनकी इच्छाओं की ज्यादा पूछताछ करना या अपनी इच्छा उन पर लादना, भविष्य में उनको एंग्जायटी में पटक देगा। जैसे किसी बच्चे को कई खिलौने ला दो तो वह खेलता नहीं है, खिलौने में उलझता है। और यदि एक खिलौना दे दो तो वो तबीयत से खेलता है। माता-पिता बच्चों के स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाएं। उन्हें सुनें अधिक, सुनाएं कम और यदि सुनाना ही है तो प्रेरक प्रसंग और आदर्श पात्रों की बात कम से कम रात को सोने के पहले अवश्य सुना दें।
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