रसरंग में मायथोलॉजी:  शक्ति की उपासना: पाषाण युग से शास्त्रीय परंपरा तक
अअनुबंधित

रसरंग में मायथोलॉजी: शक्ति की उपासना: पाषाण युग से शास्त्रीय परंपरा तक

Spread the love




भारत में देवी पूजा की शुरुआत कब हुई, यह निर्धारित करना काफी कठिन है। संभव है कि इसकी शुरुआत पाषाण युग में हुई हो। यह वह समय था, जब मनुष्य धरती को देवी या किसी महिला के गर्भाशय से जोड़कर देखने लगा था। इसी दौर में पेड़ों और नदियों को भी देवी के रूप में मानने की प्रवृत्ति विकसित हुई। मध्य प्रदेश की सोन नदी घाटी में बाघोर गांव के पास एक पत्थर मिला है, जिस पर त्रिकोणीय चिह्न बने हैं। लगभग 10,000 वर्ष पुराना यह बाघोर पत्थर पूजा में प्रयुक्त भारत की सबसे प्राचीन वस्तु माना जाता है। त्रिकोणीय चिह्न को इस देवता के लिंग से जोड़ा गया है, लेकिन यह निष्कर्ष तांत्रिक ज्यामिति के आधार पर निकाला गया है, जो उस पत्थर के निर्माण के लगभग 9,000 वर्ष बाद प्रचलित हुई।
प्रारंभिक देवी-पूजक मनुष्यों की अभिव्यक्तियों को आज समझ पाना संभव नहीं है। इसलिए उनके बारे में न तो कोई धर्मग्रंथीय प्रमाण उपलब्ध हैं और न ही ठोस भौतिक साक्ष्य। संभवतः उन्होंने चट्टानों, मिट्टी, पत्तों और टहनियों जैसी नैसर्गिक वस्तुओं से देवियों की कल्पना की हो। ऐसे अनुष्ठानों में प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग आज भी भारत में देखा जा सकता है। लंबी कालावधि के कारण इन प्रारंभिक देवियों के भौतिक प्रमाण नष्ट हो गए। इन्हें ही आगे चलकर कुलदेवी और ग्रामदेवी के रूप में जाना गया, जिनकी पूजा आज भी प्रचलित है। प्राचीन मंदिरों में देवी को अक्सर हल्दी, कुमकुम या नारंगी रंग से लिप्त एक चट्टान के रूप में दर्शाया गया है, जिसके ऊपरी भाग पर चांदी जैसी आंखें अंकित होती हैं। यही भारत की प्रारंभिक देवियां थीं। उनकी पूजा कब शुरू हुई, यह कहना आज असंभव है।
ग्रंथों में देवियों का प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जो 3,000 वर्ष से भी अधिक पुराना है। इसमें भोर की देवी ‘उषा’, वन की देवी ‘अरण्यानि’ और वाणी की देवी ‘वाच’ का उल्लेख है। इसी ग्रंथ में शक्ति की देवी ‘दुर्गा’ और समृद्धि की देवी ‘श्री’ का भी जिक्र मिलता है। हालांकि, इन सभी संदर्भों में देवियों के शारीरिक रूप का वर्णन नहीं है, बल्कि उनके वैचारिक स्वरूप की ही चर्चा है।
देवी-सदृश सबसे प्राचीन प्रतिमा एक स्तूप में मिली है, जिसे संभवतः लोककथाओं में वर्णित यक्षी (एक उग्र आत्मा) से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह केवल एक अनुमान है, क्योंकि स्तूपों के मुहरों पर क्या छपा है, हम निश्चित रूप से नहीं जानते हैं। हड़प्पा की सभ्यता के लगभग 2,000 वर्ष बाद और ऋग्वेद के समयकाल के करीब 1,000 वर्ष पश्चात गुप्त राजवंश और भारतीय-यूनानी कुषाण राजवंश के सिक्कों पर देवियों की प्रतिमाएं अंकित होने लगीं। इन सिक्कों पर देवी को सोने से भरे पात्र के साथ दर्शाया गया है, जो आगे चलकर लक्ष्मी की प्रतिमा के रूप में विकसित हुई। ऐसी प्रतिमाएं सांची और भरहुत के बौद्ध स्तूपों में भी मिलती हैं। सरस्वती की प्रारंभिक प्रतिमा मथुरा के कंकाली टीला से प्राप्त हुई है, जो जैन परंपरा से जुड़ी है। इन सभी देवियों को दो भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। चार भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा उत्तरकालीन कुषाण कला में मिलती है, जहां वह एक महिष का वध करती दिखाई देती हैं। यही रूप आगे चलकर दुर्गा के रूप में विकसित हुआ। 7वीं सदी में पल्लव और चालुक्य काल की कला के माध्यम से यह स्वरूप व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ।
लगभग 1500 वर्ष पहले, गुप्त काल तक आते-आते देवियों की स्वतंत्र पहचान बनने लगी थी। बौद्ध धर्म में तारा और महामयूरी को बुद्ध की सहचरी के रूप में, जबकि हिंदू परंपरा में देवियों को विष्णु और शिव की पत्नियों के रूप में दिखाया जाने लगा। उदाहरणार्थ, ओडिशा के 7वीं सदी के परशुरामेश्वर मंदिर में देवी को शिव के पास बैठकर उन्हें भोजन कराते हुए दर्शाया गया है। इसी प्रकार की प्रतिमाएं मुंबई के निकट एलिफेंटा गुफाओं में भी मिलती हैं। इसी कालावधि में वे देवियां उभरीं, जिनसे हम आज परिचित हैं, विशेष रूप से लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती और पार्वती। ये सौम्य एवं दो-भुजाओं वाली देवियां अधिक भव्य और बहु-भुजाओं वाले शिव, विष्णु और ब्रह्मा की सहचरियों के रूप में प्रस्तुत की गईं। अगले सप्ताह के लेख में हम समझेंगे कि बहु-भुजाओं वाली देवियों के और कौन-कौन से रूप विकसित हुए, वे राजसत्ता से कैसे जुड़ीं और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी क्या भूमिका रही।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *