पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  थोड़ी-सी समझ भी अगर दिखाएं तो रिश्ता बच जाता है
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: थोड़ी-सी समझ भी अगर दिखाएं तो रिश्ता बच जाता है

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5 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

वैसे तो पूरी दुनिया में हम तलाक के मामले में सबसे पीछे हैं, लेकिन पिछले 5-7 साल में वृद्धि हुई है। लोग तनावपूर्ण दाम्पत्य जीवन से शांतिपूर्ण अलगाव को प्राथमिकता दे रहे हैं। लेकिन फिर भी अंतिम प्रयास किया जाना चाहिए कि परिवार न टूटें।

पिछले दिनों मेरे देखते-देखते हमारे सम्पर्क में एक वर्ष में दस परिवारों में ऐसी घटनाएं घटी और मुझे कहीं ना कहीं कोई भूमिका निभानी पड़ी। तो मैंने देखा, टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी यानी विषाक्त पुरुषत्व और टॉक्सिक फेमिनिज्म- यानी स्त्रियों में पुरुष के दोष देखने की वृत्ति- ये दोनों बातें संबंधों पर प्रभाव डाल रही हैं।

साफ दिखता है कि थोड़ी-सी समझ अगर होती तो रिश्ता बच जाता। असहनीय स्थिति में मुक्ति बुरी नहीं, लेकिन तलाक भी फैशन बन जाए तो खतरा है। रावण टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी का शिकार था और उसकी बहन शूर्पनखा टॉक्सिक फेमिनिज्म से ग्रस्त थी। जिस घर में पुरुष के भीतर का रावण और स्त्री के भीतर की शूर्पनखा अंगड़ाई लेगी, वहां परिवार बचाना मुश्किल होगा।

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