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- Pt. Vijay Shankar Mehta Column | How Jealousy And Comparison Affect Life
17 मिनट पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
हर मनुष्य भीतर से कहीं ना कहीं ईर्ष्यालु होता है। ईर्ष्या की शुरुआत होती है तुलना से। तुलना शब्द तौल से बना है। जब हम तराजू के एक पलड़े में खुद को रखते हैं, दूसरे में दूसरों को और नापतौल करते हैं तो इसी को तुलना कहते हैं। तो जब जीवन में तुलना उतरे तो जिज्ञासा के साथ तुलना करना।
जानने की कोशिश करना कि अगर हम पीछे हैं तो क्यों हैं, इस तुलना से हमें क्या अच्छा मिल सकता है? और अगर हम ईर्ष्या में उतर जाएं तो फिर चिंतन करना। जिसके प्रति हम ईर्ष्या पाल रहे हैं उसका तो कुछ होगा नहीं, लेकिन हमारा नुकसान यह है कि कॉर्टिसोल और एड्रेनलिन, ये दो हार्मोन ईर्ष्या से बढ़ते हैं। हमारे भीतर चिड़चिड़ापन, बेचैनी, उदासी आदि ईर्ष्या का परिणाम बन जाते हैं।
ईर्ष्या और तुलना यदि हमारे भीतर हैं तो सावधानी से इनका उपयोग किया जाए। जिस भी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या जागे, प्रयास करिए कि हम उसकी सराहना कैसे करें। उन बिंदुओं को ढूंढिए, जहां हम उसकी प्रशंसा कर सकते हों। उन बातों को दिमाग में उतारें, जहां हम उससे कुछ सीख सकते हों। तो यह दो बातें भी हमारे लिए लाभकारी हो सकती हैं।









