पवन के. वर्मा का कॉलम:  हमारे नेता आज भी अटल जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं
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पवन के. वर्मा का कॉलम: हमारे नेता आज भी अटल जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मशती-वर्ष पर आयोजित समारोहों का सिलसिला गत दिसम्बर तक चलता रहा था। इसी कड़ी में पूर्व मंत्री विजय गोयल ने वाजपेयी पर एक चित्रात्मक-जीवनी प्रकाशित करवाई है, जो उनके जीवन की समृद्ध-झांकी पेश करती है। लेकिन जब तक हम उनकी विरासत के कुछ अहम सबकों को फिर से नहीं सीखते, हम देश के इस सच्चे सपूत का सही मायनों में अभिवादन नहीं कर पाएंगे। पहला सबक यह है कि लोकतंत्र में राजनीतिक विरोधी हो सकते हैं, लेकिन शत्रु नहीं। वाजपेयी संघ के निष्ठावान सदस्य और भाजपा के समर्पित सिपाही थे। लेकिन वे असहमत होने वाले लोगों के साथ भी सभ्य संवाद को तत्पर रहते थे। इसी के चलते राजनीतिक विचारधाराओं के परे भी उन्होंने सच्चे दोस्त बनाए। सच में तो हमें उस राजनीतिक दौर को ही पुनर्जीवित करने की जरूरत है, जिसमें जवाहर लाल नेहरू उस वक्त के युवा सांसद वाजपेयी में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता बता कर उनकी सराहना किया करते थे। नेहरू ने यह बात तब कही थी, जब वाजपेयी ने 1962 के युद्ध के दौरान अपने भाषण में नेहरू की तीखी आलोचना की थी। इसी तरह, अटल जी ने कांग्रेस से गहरे मतभेदों के बावजूद 1971 के पाकिस्तान युद्ध में जीत के बाद इंदिरा गांधी की खुले दिल से प्रशंसा की थी। उनके जैसे महान नेताओं के लिए राजनीतिक विरोधियों का व्यक्तिगत अपमान असभ्यता की श्रेणी में आता था। उन्होंने एक बार कहा था कि ‘मैं 1952 से चुनाव लड़ रहा हूं, लेकिन मैंने कभी किसी पर कीचड़ नहीं उछाला।’ दूसरा सबक है राजनीति में नैतिकता का महत्व। कोई दल पूरी तरह से बेदाग नहीं, लेकिन फिर भी कुछ लक्ष्मण-रेखाएं होती हैं, जिन्हें बड़े नेता महज सत्ता में बने रहने या चुनाव जीतने के लिए नहीं लांघते। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तब देखने को मिला, जब 1996 में वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास-मत हार गई। उस मौके पर दिया वाजपेयी का भाषण नेताओं के लिए नित्य-पठनीय होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि सत्ता में बने रहने की शर्त यदि पार्टी तोड़कर नया गठबंधन बनाना है तो वे ऐसी सत्ता को चिमटे से भी नहीं छुएंगे। इसकी तुलना आज से दौर से करिए, जहां धनबल और प्रलोभनों से विधायकों को तोड़कर सरकारें बनाई जाती हैं। खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए जनप्रतिनिधियों को पांच सितारा होटलों की बाड़ेबंदी में रखा जाता है। तीसरा सबक है कि एक सच्चा स्टेट्समैन बनने के लिए आपको सफल राजनेता और अच्छा इंसान, दोनों बनना पड़ेगा। वाजपेयी के जीवन के कुछ पहलू काफी चर्चित हैं। गहराई और हास्यबोध से भरपूर उनकी वाकपटुता और इसके साथ ही उनका राजनीतिक संकल्प, जो उन्होंने पोकरण में दिखाया। लेकिन एक इंसान के तौर पर अपनी प्रवृत्ति, स्वभाव और आस्था से वे सच्चे लोकतांत्रिक थे। इसीलिए उनकी कैबिनेट एक ‘कॉलेजियम’ की तरह काम करती थी, जहां निडर होकर राय रखी जा सकती थी। आज की तरह नहीं, जहां अधिकतर दलों में कोई भी सुप्रीमो के खिलाफ आवाज उठाने की जुर्रत नहीं करता। वाजपेयी का राष्ट्रवाद किसी को वंचित करने वाला नहीं था। उन्होंने सत्ता को अहंकार में नहीं बदलने दिया। सभी का सम्मान किया और सवालों के लिए खुले रहे। एक बार तो उन्होंने एक पत्रकार को भी कड़े सवाल न पूछने पर टोक दिया था। उनसे जुड़ा एक किस्सा मेरे पास भी है। अटल जी ने मुझसे अपनी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने को कहा था। जब हम प्रधानमंत्री आवास पर मिले तो मैंने कहा कि मेरी तीन शर्तें हैं। पहली, मैं उनकी राजनीतिक कविताओं का अनुवाद नहीं करूंगा। दूसरी, उनकी कविताओं में से भी मैं खुद ही चयन करूंगा। और तीसरी, मेरे कुछ अनुवाद देखने के बाद ही वे कोई अंतिम निर्णय लें। चिर-परिचित मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, ‘मंजूर है।’ एक अदना-सा सरकारी संयुक्त सचिव प्रधानमंत्री के सामने शर्तें रख सके, यह बात बहुत कुछ कहती है। प्रकाशित पुस्तक की मेरी प्रति में उन्होंने लिखा कि ‘पवन ने मेरी कविताओं का अनुवाद किया और उन्हें अधिक अर्थपूर्ण बना दिया।’ वाजपेयी जी जैसी महान हस्ती को हमें महज सालाना समारोहों के जरिए नहीं, बल्कि उन आदर्शों को अपना कर जीवित रखना चाहिए, जिनके लिए वे हमेशा डटे रहे। वाजपेयी संघ के निष्ठावान सदस्य और भाजपा के समर्पित सिपाही थे। लेकिन वे असहमत होने वाले लोगों के साथ भी सभ्य संवाद को तत्पर रहते थे। इसी के चलते राजनीतिक विचारधाराओं के परे भी उन्होंने सच्चे दोस्त बनाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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