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केरल की हालिया यात्रा के दौरान मैंने कुछ अजीब देखा। कई शहरों में बहुत-सी चाय की दुकानें बंद थीं। एक स्थानीय मलयाली चायवाले ने कहा कि ‘बिना एलपीजी सिलेंडर के हम क्या करें? हम जानते हैं कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण यह किल्लत हुई है, हम किसी को दोष भी नहीं दे रहे, लेकिन क्या सरकार हमारी समस्या को स्वीकार भी नहीं कर सकती?’ शोरशराबे में यह छोटी-सी बात अनदेखी रह सकती है, लेकिन यह उस आर्थिक अंडरकरंट को बताती है, जिसे सियासी वर्ग स्वीकारने से हिचक रहा है। आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि सब ठीक है, लेकिन जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा नाजुक है। पश्चिम एशिया में तनाव ने आपूर्ति मार्ग बाधित किए हैं, खासकर होर्मुज स्ट्रेट में। इससे माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ी है। लेकिन यहीं पर एक अहम विषय भी है: वैश्विक व्यवधान संकट शुरू कर सकते हैं, लेकिन घरेलू नीतियां तय करती हैं कि इसका असर कितना होगा। और इसी जगह सरकार का ‘ऑल इज वेल’ वाला नैरेटिव खोखला नजर आता है। एलपीजी को ही लें। लाखों परिवारों तक स्वच्छ ईंधन पहुंचना बीते दशकों की सबसे बदलावकारी और कल्याणकारी उपलब्धियों में से एक है। लेकिन क्या फायदा, जब वह सस्ती न हो? भारत आज भी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85% आयात करता है। एलपीजी में भी 60% से ज्यादा निर्भरता आयात पर है। वैश्विक कीमतों में किसी भी कारण से उछाल आए, असर भारतीय रसोइयों तक पहुंचता ही है। मोदी सरकार भी निष्क्रिय नहीं रही है। उसने ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती की और एलपीजी खपत को प्राथमिकता आधारित बनाया। इससे कुछ राहत मिली, लेकिन यह चिंता भी है कि विधानसभा चुनावों के बाद कीमतें फिर न बढ़ जाएं। बहरहाल, यह तो कहानी का एक पहलू है। असली सवाल है कि जब कच्चे तेल की कीमतें कम थीं तो उसका फायदा उपभोक्ताओं को क्यों नहीं दिया गया? उलटे, टैक्स बढ़ाए गए ताकि उपभोक्ता बढ़ी कीमतें चुकाता रहे और सरकारी खजाना सुरक्षित रहे। आज दिख रहे असंतोष का कारण यही असमानता है। यदि हमारे नेता वीवीआईपी आभामंडल से बाहर निकल कर देखें तो इसके असर हर जगह दिख रहे हैं। केरल का चायवाला बढ़ती लागत के कारण दुकान बंद कर देता है। चेन्नई का डिलीवरी वर्कर ईंधन पर क्षमता से ज्यादा खर्च कर रहा है। किसान डीजल और खाद की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। दिहाड़ी मजदूर रोजीरोटी गंवा रहा है। यह दिखाता है कि कैसे दूरदराज के युद्ध घरेलू संकट में बदल जाते हैं। फिर भी, प्रतिक्रियाओं में आपूर्ति को पर्याप्त बता कर दोष कालाबाजारी और मुनाफाखोरी पर डाला जाता है। सकारात्मक पक्ष देखें तो बीते दशक में हमारी अच्छी विकास दर और अपेक्षाकृत कम महंगाई ने आशावादी होने की वजह दी है। लेकिन व्यापक स्थिरता का महत्व तभी है, जब जमीनी हालात भी बेहतर हों। एक गहरी रणनीतिक चिंता और भी है। भारत आयातित ऊर्जा पर अपनी निर्भरता को जानता है, फिर भी वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में हमारे कदम असंगत रहे हैं। चीन ने दीर्घकालिक समझौते, रणनीतिक भंडार, विविध स्रोतों और रिन्यूएबल एनर्जी में विस्तार से अपनी सुरक्षा मजबूत की है। इसके उलट, भारत पहले से तैयारी के बजाय प्रतिक्रियात्मक अधिक नजर आता है। यह सच है कि ऊर्जा बदलावों में समय लगता है और भारत की विकास संबंधी जरूरतें भी बड़ी हैं। इसीलिए तत्काल कदम उठाना भी जरूरी है। पहला कदम है- ईमानदारी। सरकारें जब कहती हैं कि असर सीमित है, तो वह खुद का फायदा नहीं कर रही होतीं। क्योंकि जब जनता की जेब तंग हो रही होती है तो वो इसे महसूस करती है- चाहे महंगा सिलेंडर हो, यात्रा खर्च महंगा हो जाए या छोटे व्यवसाय चलाना मुश्किल हो जाए। इस हकीकत को स्वीकारना कमजोरी नहीं, बल्कि भरोसेमंद नीति की नींव है। दूसरा कदम है- तत्काल राहत। ईंधन पर एक पारदर्शी और नियम आधारित ढांचा जरूरी है, ताकि तेल कीमतें गिरने पर उपभोक्ताओं को फायदा मिले। एलपीजी सब्सिडी पर भी पुनर्विचार जरूरी है। आज दबाव निम्न मध्यम वर्ग तक फैल चुका है। ऐसे में अल्पकालिक राहत काफी नहीं होगी। भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अधिक गंभीर प्रयास करने होंगे। नवीकरणीय ऊर्जा तेजी से अपनानी होगी। सबसे महत्वपूर्ण है ऊर्जा नीति को आर्थिक रणनीति के साथ जोड़ना, क्योंकि ऊर्जा ही कृषि, उद्योग और सेवा जैसे प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों का आधार है। सकारात्मक पक्ष देखें तो बीते दशक में हमारी अच्छी विकास दर और अपेक्षाकृत कम महंगाई ने आशावादी होने की वजह दी है। लेकिन व्यापक स्थिरता का महत्व तभी है, जब जमीनी हालात भी बेहतर हों।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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