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मनुष्य के छह शत्रुओं में एक लोभ भी है। इसका अर्थ है अतिरिक्त लालसा, अनुचित की मांग। यह धन, पद, वस्तु, शरीर- इन पर काम करता है। मोटे तौर पर लोभ और लालच एक ही हैं। छोटा-सा फर्क ये है कि लोभ, यानी जो आपके पास है, उसको और बढ़ाएं। और लालच, यानी जो दूसरों के पास है, उसे पाने की लालसा। लोभ का एक ही इलाज है, संतोष की वृत्ति को अधिक किया जाए। तुलसीदास जी ने प्रसंग लिखा है कि काकभुशंडि जी ने पक्षीराज गरुड़ को कहा, आप ही को मोह हो गया हो, ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े मोह और लोभ में डूबे। ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार, केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार- इस संसार में कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान और गुणों का धाम है, जिसकी लोभ ने विडंबना यानी मिट्टीपलीत ना की हो। अगर हमने लोभ के साथ संतोष की वृत्ति को नहीं जोड़ा तो लोभ हमारे पुरुषार्थ को अशांति में बदल देगा। कर्म करते समय अशांत होंगे और फल मिलने के पश्चात भी बेचैन ही बने रहेंगे।
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