आनंद निगम। उज्जैन51 मिनट पहले
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12 ज्योतिर्लिंगों में भगवान महाकालेश्वर का विशेष स्थान है। उज्जैन का महाकाल मंदिर देश का प्रमुख शिवधाम है और यहां भगवान शिव दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उज्जैन में महाकाल की उत्पत्ति कैसे हुई? भगवान महाकाल ने उज्जैन को ही क्यों चुना? पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव यहां भक्तों की रक्षा के लिए महाकाल रूप में प्रकट हुए थे।
आज सावन का आखिरी सोमवार है। दैनिक भास्कर बता रहा है भगवान महाकाल की उत्पत्ति से लेकर महाकाललोक बनने तक की पूरी कहानी।
राजा चंद्रसेन थे परम शिव भक्त
महाकाल मंदिर में महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि महाराज के अनुसार, प्राचीन समय में उज्जैन को अवंतिका के नाम से जाना जाता था। यहां के राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे। वे नियमित रूप से शिव की आराधना करते थे।
एक ब्राह्मण बालक ने राजा चंद्रसेन को शिव की पूजा करते देखा। वह भी भगवान शिव की भक्ति से प्रभावित हुआ और पूरी श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करने लगा।
सबसे पहले देखिए महाकाल मंदिर की पुरानी तस्वीर…

ये महाकाल मंदिर की सालों पुरानी तस्वीर है जो इंटरनेट पर भी है।
दूषण के आतंक से कांप उठा था उज्जैन
इसी दौरान दूषण नाम का एक शक्तिशाली दैत्य लोगों पर अत्याचार कर रहा था। वह जहां जाता, वहां साधु-संतों और भगवान की आराधना करने वाले लोगों को परेशान करता था।
जब दूषण के उज्जैन आने की खबर राजा चंद्रसेन को मिली तो वे भयभीत हो गए। लेकिन जिन बालकों ने भगवान शिव की आराधना शुरू की थी, उनका विश्वास नहीं डगमगाया। उन्होंने दैत्य के डर से भी शिव पूजा नहीं छोड़ी।

शक्तिशाली दैत्य ने साधु-संतों और लोगों पर अत्याचार किया।
भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट हुए महाकाल
पौराणिक कथा के अनुसार, जब दूषण ने उन बालकों को मारने का प्रयास किया, तब भगवान शिव महाकाल के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने दूषण का वध कर भक्तों की रक्षा की।
इसके बाद भगवान शिव इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित हो गए। यही ज्योतिर्लिंग आगे चलकर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
महाकाल ज्योतिर्लिंग की खासियत क्या है?
महंत विनीत गिरि महाराज के अनुसार, सनातन परंपरा में शिवलिंग के अलग-अलग स्वरूप बताए गए हैं। स्वयंभू शिवलिंग, पार्थिव शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग प्रमुख हैं। देश में कुल 12 ज्योतिर्लिंग माने गए हैं और इनमें भगवान महाकालेश्वर का विशेष स्थान है।
उज्जैन को मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में भी शामिल किया जाता है। यहां महाकालेश्वर के अलावा हरसिद्धि माता, काल भैरव सहित अनेक प्राचीन मंदिर और तीर्थ हैं। यही कारण है कि उज्जैन को शिव और तीर्थों की नगरी के रूप में भी विशेष पहचान मिली है।

मंदिर व शिवलिंग को बचाने पानी में शिवलिंग को छिपा दिया गया था।
कब-कब हुआ विस्तार और किसने कराया पुनर्निर्माण?
उज्जैन का महाकाल मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने इतिहास और कई राजवंशों के उतार-चढ़ाव का भी साक्षी रहा है। मान्यता है कि मंदिर की परंपरा द्वापर युग से भी पहले की है। समय के साथ मंदिर पर कई बार संकट आया, इसे नुकसान पहुंचा और अलग-अलग शासकों ने इसका पुनर्निर्माण कराया।
द्वापर युग से पहले की मानी जाती है स्थापना
संस्कृति एवं पुरातत्वविद् भगवती लाल राजपुरोहित के अनुसार, पौराणिक मान्यताओं में महाकाल मंदिर की स्थापना द्वापर युग से पहले की बताई जाती है।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण जब उज्जैन में शिक्षा ग्रहण करने आए थे, तब उन्होंने महाकाल स्त्रोत का गान किया था। छठी शताब्दी में राजा चंद्रप्रद्योत के समय महाकाल उत्सव होने का उल्लेख भी मिलता है। बाद के साहित्य में भी महाकाल मंदिर का वर्णन मिलता है।

राजा भोज ने मंदिर का विस्तार करवाया था।
राजा भोज ने कराया मंदिर का विस्तार
11वीं शताब्दी में राजा भोज के समय उज्जैन में कई मंदिरों का निर्माण और विस्तार कराया गया। इनमें महाकाल मंदिर भी शामिल था। बताया जाता है कि राजा भोज ने मंदिर के शिखर को भी ऊंचा करवाया था। 7वीं शताब्दी के बाणभट्ट के साहित्य में भी महाकाल मंदिर का वर्णन मिलने की बात कही जाती है।
1234 में इल्तुतमिश के हमले से मंदिर को नुकसान
इतिहास के अनुसार 13वीं शताब्दी में दिल्ली के शासक इल्तुतमिश ने उज्जैन पर हमला किया। इस दौरान महाकाल मंदिर को भी नुकसान पहुंचा। इसके बाद मंदिर की मूल संरचना लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रही। स्थानीय परंपरा के अनुसार ज्योतिर्लिंग की पूजा किसी न किसी रूप में जारी रही।

करीब 500 साल बाद राणोजी सिंधिया ने कराया पुनर्निर्माण
मराठा शासन के दौरान उज्जैन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व फिर बढ़ा। ग्वालियर के सिंधिया राजवंश के संस्थापक राणोजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर के पुनर्निर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा का काम कराया।
कहा जाता है कि राणोजी सिंधिया ने उज्जैन में महाकाल मंदिर की दुर्दशा देखी तो उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उन्होंने अधिकारियों और स्थानीय कारोबारियों को मंदिर निर्माण पूरा कराने के निर्देश दिए। बंगाल विजय से लौटने के बाद उन्होंने नवनिर्मित मंदिर में महाकाल की पूजा की।
राणोजी सिंधिया की समाधि आज भी शुजालपुर में
महाकाल मंदिर के पुनर्निर्माण और धार्मिक आयोजनों की पुनः शुरुआत के बाद राणोजी सिंधिया की एक यात्रा के दौरान शुजालपुर में मृत्यु हो गई। उनकी समाधि वहीं बनाई गई, जो आज भी मौजूद है। समाधि पर उनकी स्मृति में मराठी भाषा में लेख भी अंकित है।

राणेजी सिंधिया की समाधि आज भी शुजालपुर में मौजूद है।
सिंहस्थ की परंपरा भी फिर शुरू हुई
मराठा काल में महाकाल मंदिर के पुनर्निर्माण के साथ उज्जैन के धार्मिक गौरव को फिर मजबूती मिली। इसी दौर में सिंहस्थ आयोजन की परंपरा को भी दोबारा शुरू कराने का श्रेय राणोजी सिंधिया को दिया जाता है।
देखिए महाकाल की भक्ति और राजा को सम्मान..

इस तरह से बड़े बड़े ढोल और डमरू लेकर भगवान की भक्ति की जाती है।

भगवान महाकाल उज्जैन के राजा हैं। उन्हें पुलिस बल द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।

घोड़ों पर सवार होकर महाकाल की सवारी में सैनिक निकलते हैं।
महाकाल ज्योतिर्लिंग को कैसे सुरक्षित रखा गया?
मंदिर पर संकट के दौर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, आक्रमण के समय पुजारियों ने ज्योतिर्लिंग को सुरक्षित रखने के लिए उसे कुंड में छिपा दिया था। बाद में परिस्थितियां सामान्य होने पर इसकी पुनर्प्रतिष्ठा की गई। मंदिर के पुराने स्वरूप से जुड़ी कई बातें इतिहास, स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में अलग-अलग रूप में मिलती हैं।
देखिए वर्तमान में श्रीमहाकाल महालोक…


ड्रोन से महाकाल मंदिर का नजारा।

महाकाल मंदिर से महाकाल लोक तक
आज महाकाल मंदिर के आसपास जिस भव्य महाकाल लोक को देखा जाता है, वह आधुनिक समय में विकसित किया गया धार्मिक और सांस्कृतिक परिसर है। इसका उद्देश्य महाकाल मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं देने के साथ उज्जैन की शिव परंपरा और पौराणिक कथाओं को भव्य रूप में प्रदर्शित करना है।
महाकाल लोक में भगवान शिव से जुड़ी कथाओं, पुराणों और शिव के विभिन्न स्वरूपों को मूर्तियों, भित्तिचित्रों और कलात्मक संरचनाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। यहां प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को शिव की कथाओं और उज्जैन की धार्मिक परंपरा से जुड़ा एक दृश्यात्मक अनुभव मिलता है।
यानी महाकाल की कहानी केवल एक मंदिर की कहानी नहीं है- यह आस्था, संघर्ष, पुनर्निर्माण और उज्जैन के बदलते धार्मिक इतिहास की सदियों लंबी यात्रा है।

प्रतिदिन आरती: आज्ञा लेकर खुलते हैं पट
महाकाल मंदिर में भगवान की प्रतिदिन पूजा-अर्चना एक तय परंपरा और विधि के अनुसार होती है। भस्म आरती से पहले पुजारी कोटि तीर्थ के जल से स्वयं को शुद्ध कर घंटी बजाकर भगवान महाकाल से मंदिर में प्रवेश की आज्ञा लेते हैं।
इसके बाद वीरभद्र, गणेश, माता पार्वती और कार्तिकेय का पूजन-अभिषेक कर गर्भगृह की पूजा प्रक्रिया शुरू होती है। भगवान महाकाल का 16 मंत्रों के उच्चारण के साथ पंचामृत, इत्र, भांग, गन्ने के रस और जल से अभिषेक किया जाता है। श्रावण के सोमवार को भगवान के उपवास की परंपरा के कारण सुबह नैवेद्य नहीं चढ़ाया जाता।

देश में 12 ज्योतिर्लिंग मौजूद
भारत में 12 ज्योतिर्लिंग मौजूद हैं। अकेले मध्य प्रदेश में ही 2 ज्योतिर्लिंग हैं। वहीं सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में 3 ज्योतिर्लिंग हैं।

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महाकाल-भोग के लिए आज भी मांगी जाती है भिक्षा

भगवान शिव को प्रिय सावन माह की शुरुआत हो गई है। देशभर से भक्तों का भगवान महाकाल के दर्शन और आशीर्वाद के लिए उज्जैन पहुंचना शुरू हो गया है। महाकाल मंदिर आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी इच्छा तड़के होने वाली भस्म आरती के दर्शन करने की होती है। पढ़ें पूरी खबर…







