रसरंग में चिंतन:  क्या ईर्ष्या करना हमारा राष्ट्रीय रोग है?
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रसरंग में चिंतन: क्या ईर्ष्या करना हमारा राष्ट्रीय रोग है?

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गुणवंत शाह2 घंटे पहले

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हमारा देश न तो कृषि प्रधान है और न ही उद्योग प्रधान, बल्कि अब धर्म प्रधान है। ऐसे धर्म प्रधान, भक्ति प्रधान और श्रद्धा प्रधान देश में जितनी ईर्ष्या दिखाई देती है, उतनी शायद ही किसी और देश में मिलती होगी। ईर्ष्या समाज को सताती है, जलाती है और गिराती भी है। ईर्ष्या करना हमारा राष्ट्रीय रोग है।

सदियां बीत गईं, लेकिन हमारे आसपास वनस्पति जगत आज भी हरा-भरा है। क्या आपने कभी ध्यान दिया कि ऐसा क्यों है? इसका सीधा कारण यह है कि वनस्पति जगत में ईर्ष्या का नामोनिशान नहीं है। इसलिए करोड़ों वर्षों बाद भी वह हरा-भरा बना हुआ है। धनिये की पत्तियां कभी मेथी की पत्तियों से ईर्ष्या नहीं करतीं। अशोक का वृक्ष फलहीन है और आम फलदार, फिर भी अशोक ने कभी आम से ईर्ष्या नहीं की। क्या आपने कभी सुना है कि वनस्पतियों में आपसी ईर्ष्या होती है? बबूल केवल बबूल है और नीम केवल नीम। दोनों अपनी जगह मस्त हैं। वटवृक्ष के पास जैसी घनी छाया होती है, वैसी किसी और वृक्ष के पास नहीं होती। संस्कृत में वटवृक्ष के लिए प्रयुक्त शब्द है ‘न्यग्रोध’। वटवृक्ष जैसी ही घटादार, छायादार और पूर्ण स्त्री के लिए शब्द है ‘न्यग्रोधपरिमंडला’। बात यह है कि सुंदर नारी अन्य नारियों में ईर्ष्या पैदा करती है, जबकि तेजस्वी पुरुष सामान्य पुरुषों में ईर्ष्या का भाव जगाता है।

किसी भी हाईस्कूल में जाने का अवसर मिले तो स्टाफ रूम में अवश्य जाएं और कुछ समय वहां बिताएं। आप देखेंगे कि जो शिक्षक या शिक्षिका तेजस्वी और प्रभावशाली होते हैं, उनसे बाकी शिक्षक-शिक्षिकाएं ईर्ष्या अवश्य करती हैं। असभ्य समाज में तेजस्वी होना एक गैर-दंडनीय अपराध है। वनस्पति जगत में ईर्ष्या नहीं है, इसलिए वृक्ष स्वस्थ हैं।

महाभारत में भीम और दुर्योधन के बीच ईर्ष्या थी। उसी तरह अर्जुन और कर्ण के बीच भी ईर्ष्या-भाव था। द्रौपदी के स्वयंवर के बाद पराजित दुर्योधन उग्र हो उठा और उसने जुए का षड्यंत्र रचा। सुंदर स्त्री युद्ध की जननी बन सकती है। कुब्जा यानी त्रिवक्रा के कारण कभी युद्ध नहीं हुआ। युद्ध तब होता है, जब ईर्ष्या पक जाती है।

किसी और को एक किलो नुकसान पहुंचाने के लिए स्वयं को एक टन का नुकसान सहना पड़ता है। ईर्ष्या मनुष्य को बहुत महंगी पड़ती है। ईर्ष्या अर्थात दूसरों को हानि पहुंचाने के लिए दिया गया अपना मानसिक बलिदान। हाथी अपनी मस्ती में चलता रहता है, पीछे से कुत्ते भौंकते रहते हैं, लेकिन उसमें ईर्ष्या का भाव नहीं होता। सियार को सिंह से ईर्ष्या नहीं होती, क्योंकि जहां हीनता की ग्रंथि होती है, वहां ईर्ष्या नहीं होती। ईर्ष्या दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच होती है। जब प्रतिस्पर्धा स्वस्थ होती है, तब ईर्ष्या-वृत्ति पुरुषार्थ की अभिप्रेरणा में बदल जाती है। दो बड़े उद्योगों की प्रतिस्पर्धा में कहीं भी व्यक्तिगत द्वेष नहीं होता। ऐसी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। साहित्यकारों, संगीतकारों और कलाकारों को यह बात बड़े उद्योगों से सीखनी चाहिए। प्रतिस्पर्धा को स्वस्थ रखना ईर्ष्या-वृत्ति को काबू में रखने का सर्वोत्तम उपाय है। सच्चा सर्जक निजी तौर पर स्वयं से प्रतिस्पर्धा करता रहता है। अपने पिछले सृजन से भी श्रेष्ठ सृजन करने की चाहत न हो, तो सर्जक कहलाने का ढोंग नहीं करना चाहिए। सर्जक का स्थायी भाव होता है – अभी तो इससे भी अच्छा आना बाकी है।

निम्न स्तर की ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी असमर्थता ही प्रकट करता है। आत्मविश्वास का अभाव ईर्ष्या का पालक पिता होता है। ईर्ष्या का जन्म मनुष्य की अपूर्णता की कोख से होता है। ईर्ष्या से बचने का उत्तम उपाय है अपने पराक्रम को भीतर से बढ़ाते रहना।

यदि लोग आपसे ईर्ष्या करते हैं, तो आप भाग्यशाली हैं। हमारे प्रति होने वाली ईर्ष्या को रोकना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। उसे रोकने के लिए कृत्रिम विनम्रता दिखाने की भी आवश्यकता नहीं है। सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को ईर्ष्या रूपी आयकर का भुगतान करना ही होता है। जो लोग ईर्ष्या करते हैं, उन्हें खुश करने की कोई जरूरत नहीं है। यदि कोई विराट कोहली से ईर्ष्या करता है, तो क्या ईर्ष्यालु की शांति के लिए विराट कोहली कम रन बनाएंगे। हमेशा याद रखें, ईर्ष्या कभी रेंगने वाले तुच्छ लोगों से नहीं होती। यदि आप ऐसे नहीं हैं, तो आप भाग्यशाली हैं।

ईर्ष्या के मनोविज्ञान की तीन बातें

ईर्ष्या के मनोविज्ञान को समझने के लिए तीन बातें याद रखनी चाहिए। पहली, ईर्ष्या समान स्तर वालों के बीच उत्पन्न होती है। दूसरी, ईर्ष्या असमर्थता का परिणाम है। और तीसरी, ईर्ष्या मनुष्य की अपूर्णता का दूसरा नाम है। ईर्ष्या-मुक्ति की साधना के बिना जीवन का आनंद मानव से दूर हो जाता है। जहां ईर्ष्या होती है, वहां सदैव अतृप्ति का वास होता है और अतृप्ति स्वयं दुख होती है। जो मानव तृप्त नहीं होता, वह समय बिताने के लिए इधर-उधर नजरें दौड़ाता रहता है। जो तृप्त और संतुष्ट है, वह इधर-उधर क्यों देखे।



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