रसरंग में मायथोलॉजी:  दक्षिण भारत से लेकर यूनान तक, किस तरह फैला जैन धर्म
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रसरंग में मायथोलॉजी: दक्षिण भारत से लेकर यूनान तक, किस तरह फैला जैन धर्म

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हम अक्सर धर्म को इतिहास, अर्थात समय के नजरिए से समझते हैं, न कि भूगोल यानी स्थान के दृष्टिकोण से। जैन धर्म का ही उदाहरण लेते हैं। हम जानते हैं कि इसका उद्गम भारत में हुआ, लेकिन यह किस क्षेत्र में जन्मा, वहां से कहां-कहां फैला और किन कारणों से इसका विस्तार हुआ, इन प्रश्नों के उत्तर जानना भी उतना ही आवश्यक है। यह समझ इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आजकल कुछ लोग जैन धर्म को हिंदू धर्म की मात्र एक उपशाखा मान लेते हैं, जो कि पूरी तरह गलत धारणा है। वस्तुतः, जहां हिंदू धर्म का विकास कृषि-आधारित समुदायों में हुआ, वहीं जैन धर्म का पोषण मुख्यतः व्यापारिक समुदायों में पनपा। जैन धर्म में वाणिज्यवाद और मठवाद के बीच स्पष्ट भेद दिखाई देता है। वाणिज्यवाद श्रावकों यानी गृहस्थों का मार्ग है, जबकि मठवाद श्रमणों यानी तपस्वियों का पथ। आइए, अगले दो लेखों में इसे विस्तार से समझते हैं।
प्राचीन काल में यज्ञ-आधारित वैदिक संस्कृति गंगा के ऊपरी मैदानी क्षेत्रों में विकसित हुई, जिन्हें आज हम दिल्ली (हस्तिनापुर), मथुरा (ब्रज), अयोध्या (कोसला) और बनारस (काशी) के रूप में जानते हैं। इसके समानांतर, संयम और तप पर बल देने वाली श्रमण परंपराएं (बौद्ध और जैन) गंगा के निचले मैदानों विशेषतः मगध क्षेत्र में विकसित हुईं।
बुद्ध को बिहार के बोध गया में प्रबोधन प्राप्त हुआ। इसी क्षेत्र के निकट झारखंड का शिखरजी पर्वत स्थित है, जहां जैन परंपरा के अनुसार 24 में से 21 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया। इनमें से एक मुनि सुव्रत, श्रीराम के काल में विद्यमान थे, जिनका उल्लेख जैन ग्रंथों में नायक के रूप में मिलता है।
जहां बौद्ध धर्म भारत से निकलकर पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी और मध्य एशिया तक फैल गया, वहीं जैन धर्म का प्रसार एक अलग दिशा में हुआ। यह दक्षिण में तमिलनाडु और कर्नाटक तथा पश्चिम में गुजरात और राजस्थान तक पहुंचा, लेकिन उत्तर में इसका विस्तार मुख्यतः हस्तिनापुर और मथुरा तक ही सीमित रहा। गांधार और कश्मीर में इसका प्रभाव बौद्ध धर्म की तुलना में बहुत कम रहा। हालांकि जैन परंपरा के पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ को अष्टापद के रहस्यमय स्थल के माध्यम से कैलाश पर्वत से जोड़ा जाता है। हमें ऐसे भ्रमणशील तपस्वियों के उल्लेख भी मिलते हैं, जो संभवतः जैन थे और सिकंदर की सेना के साथ फारस और यूनान तक गए। कहा जाता है कि ये साधु अपने जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के बाद आमरण उपवास या आत्मदहन के लिए तत्पर रहते थे। यूनानी सैनिक उनकी इस जीवन-दृष्टि से चकित थे। इसके अतिरिक्त, जैन धर्मावलंबियों के जम्बूद्वीप और भारतवर्ष के बाहर जाने के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं।
‘जम्बूद्वीप’ शब्द का सबसे प्रारंभिक उल्लेख सम्राट अशोक के तीसरी सदी ईसा पूर्व के शिलालेखों में मिलता है। हालांकि अशोक बौद्ध धर्म के संरक्षक थे, लेकिन जैन किंवदंतियों के अनुसार उनके दादा चंद्रगुप्त मौर्य और पोते संप्राति, दोनों जैन धर्म के अनुयायी थे। चंद्रगुप्त का निधन कर्नाटक में जैन परंपराओं के अनुसार हुआ, जबकि संप्राति ने जैन साधुओं को तमिलाकम अर्थात तमिल भाषी क्षेत्र में धर्म प्रचार के लिए प्रेरित किया, ठीक उसी प्रकार जैसे अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं को श्रीलंका भेजा था। भारत के लिए ‘भारतवर्ष’ शब्द का प्रयोग पहली सदी ईस्वी में कलिंग के जैन राजा खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मगध से एक जैन प्रतिमा को वापस लाने का उल्लेख किया है। उन्होंने जैन तपस्वियों के विश्राम के लिए 117 गुफाओं का निर्माण भी करवाया।
खारवेल के शिलालेख यह भी बताते हैं कि जैन धर्म बिहार से कलिंग तक फैला। यह क्षेत्र समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जैन धर्म मुख्यतः व्यापारी समुदायों से जुड़ा रहा है। लगभग चौथी सदी ईस्वी में रचित तमिल महाकाव्य ‘तिरुक्कुरल’ में शाकाहार का समर्थन और पशु बलि का विरोध मिलता है, जो जैन प्रभाव को दर्शाता है। इसी प्रकार तमिल ग्रंथ ‘जीवकचिंतामणि’ पर भी जैन प्रभाव स्पष्ट है, जहां उसका नायक जीवक भोग-विलास, काम और हिंसा से भरे जीवन के बाद अंततः जैन तपस्वी बन जाता है।
मदुरै के समीप समनार अर्थात श्रमण पर्वत स्थित हैं, जिनकी गुफाओं में तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं। वर्षा ऋतु में यात्रा वर्जित होने के कारण जैन साधु इन गुफाओं में निवास करते थे। लगभग छठी सदी ईस्वी से जब हिंदू धर्म के आलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) पंथों का उदय हुआ, तब जैन धर्म के प्रति विरोध भी बढ़ने लगा।
अगले सप्ताह हम देखेंगे कि जैन धर्म कर्नाटक में कैसे फैला और फला-फूला और आज गुजरात व राजस्थान में यह किस प्रकार अपनी जड़ें मजबूत किए हुए है।



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