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- Kapoor Family Tribute | Raj Kapoor, Rishi Kapoor & Krishna Kapoor Remembered
रूमी जाफरी3 घंटे पहले
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ऋषि कपूर अपनी मां कृष्णा कपूर के साथ
राज कपूर, कृष्णा कपूर और ऋषि कपूर। आज ये तीनों इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा की आत्मा में ये अब भी बसते हैं। सिनेमा में राज कपूर और उनके पुत्र ऋषि कपूर के योगदान को तो कोई नहीं भूल सकता, लेकिन मैं इन दोनों के साथ कृष्णा आंटी को भी याद करता हूं, क्योंकि उनके बिना ये दोनों पिता-पुत्र उस मुकाम तक शायद नहीं पहुंच पाते, जहां तक ये पहुंचे। इन तीनों पर एकसाथ लिखने का मेरा बहुत अरसे से मन था। तो आज एक कॉलम इन्हीं तीनों को समर्पित।
सब जानते हैं कि राज कपूर एक ऐसे फिल्मकार थे, जिनके लिए सिनेमा ही उनका संसार था। उनके बारे में मशहूर है कि वे इतने जुनूनी थे कि ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्म बनाने के लिए उन्होंने अपना स्टूडियो तक गिरवी रख दिया था। जब ‘बॉबी’ सुपरहिट हुई और उनके सारे कर्ज उतर गए, तो उन्होंने पटकथा लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास को एक नई कार गिफ्ट कर दी। सिर्फ कार ही नहीं, बल्कि ड्राइवर की तनख्वाह और पेट्रोल का खर्च भी आरके प्रोडक्शन ने ही उठाया। राज साहब का मानना था कि अगर मेरा सपना पूरा हुआ है, तो उन सबका सपना भी पूरा होना चाहिए जिन्होंने मेरा साथ दिया।
अगर राज साहब आरके स्टूडियो की आत्मा थे, तो कृष्णा आंटी उनके उसी साम्राज्य की मजबूत बुनियाद। फिल्म इंडस्ट्री की सबसे ग्रेसफुल महिला मानी जाने वाली कृष्णा कपूर जमीन से इतनी जुड़ी थीं कि उनका बड़प्पन सबको हैरान कर देता था। उनकी सोहबत का जादू ऐसा था कि जो भी उनके करीब आता, उनसे मुतासिर (प्रभावित) हुए बिना नहीं रहता। वे केवल एक अच्छी मेजबान ही नहीं थीं, बल्कि रिश्तों को संजोने की कला भी जानती थीं। उनके लिए परिवार और दोस्त ही उनकी असली पूंजी थे। विदेशी दौरों पर भी वे अपने स्टाफ और करीबियों का ख्याल एक मां की तरह रखती थीं। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी गरिमा थी कि पूरी इंडस्ट्री उनके सामने अदब से सिर झुकाती थी। वे कपूर खानदान की वह धुरी थीं, जिसने सबको एक सूत्र में बांधे रखा।
और अब बात बेटे ऋषि कपूर यानी चिंटू जी की। राज साहब की विरासत को चिंटू जी ने न केवल एक्टिंग बल्कि रिश्तों के मामले में भी बखूबी आगे बढ़ाया। इसकी मिसाल ऋषि कपूर और राहुल रवैल की दोस्ती में देखी जा सकती है। हालांकि दोनों के मिजाज अलग थे और अक्सर उनमें तीखी बहस होती थी, लेकिन वे एक-दूसरे के बिना रह नहीं पाते थे। इनकी दोस्ती का एक किस्सा, जिसका मैं खुद गवाह हूं, बताता हूं। एक बार ऋषि कपूर से राहुल रवैल नाराज हो गए और बात करना बंद कर दिया। ऋषि कपूर जैसा बड़ा स्टार अपने दोस्त को मनाने के लिए बेचैन हो गया। राहुल जी और ऋषि कपूर 33 सालों तक मेरे भी बेहद करीबी दोस्त रहे। इसलिए चिंटू जी ने मेरे घर एक डिनर पार्टी रखवाई ताकि किसी तरह राहुल जी से पैचअप हो सके। उस शाम चिंटू जी एक बच्चे की तरह राहुल रवैल के पीछे-पीछे घूमते रहे और आखिरकार भावुक होकर रवैल जी ने उनसे अपनी दोस्ती फिर से बहाल कर ली। ऋषि कपूर का यह रूप बताता है कि कामयाबी के शिखर पर होने के बावजूद उनके लिए पुराने दोस्त और पुराने रिश्ते सबसे ऊपर थे। वे अक्सर कहते थे कि बुढ़ापे में अपनों से क्या रूठना, क्या पता कल कौन साथ हो और कौन नहीं।
इस परिवार की सबसे बड़ी ताकत इनका आपसी जुड़ाव रहा है। 30 सितंबर 2018 को जब ऋषि कपूर की बीमारी की खबर आई, तो पूरा परिवार गहरे सदमे में था। नियति का खेल देखिए कि उसी रात कृष्णा आंटी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मानो वे अपने बेटे का दुख झेल नहीं पाईं या शायद ऊपर जाकर उनके लिए दुआओं का रास्ता साफ करना चाहती थीं। यह इत्तेफाक ही था कि जब परिवार के लोग ऋषि कपूर के इलाज के लिए अमेरिका जा रहे थे, तभी इस वटवृक्ष की छाया हमेशा के लिए उठ गई।
कपूर खानदान की यह त्रिमूर्ति हमें सिखाती है कि फिल्में तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन जो चीज हमेशा जिंदा रहती है, वह है इंसानियत, बेमिसाल दोस्ती और रिश्तों के प्रति अटूट वफादारी। आरके का अर्थ केवल ‘राज कपूर’ नहीं, बल्कि ‘रिश्तों का कारवां’ भी बन गया। जैसा कि आरके की फिल्मों में अक्सर कहा गया, ‘द शो मस्ट गो ऑन’, यह परिवार आज भी अपनी विनम्रता, कला और स्मृतियों के जरिए हमारे दिलों में धड़कता है। उनकी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि सफलता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, इंसान का कद उसकी सादगी और दूसरों के प्रति उसके प्रेम से ही मापा जाता है। आज इन तीनों की याद में फिल्म ‘आप की कसम’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए। जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते…









