रसरंग में मायथोलॉजी:  हिंदू देवता: युद्ध के ही नहीं, कला व सौंदर्य के भी प्रतीक
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रसरंग में मायथोलॉजी: हिंदू देवता: युद्ध के ही नहीं, कला व सौंदर्य के भी प्रतीक

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आज की सनातनी हिंदुत्ववादी सोच में युद्ध की धारणा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। परिणामस्वरूप, जीवन की लगभग हर गतिविधि को संघर्ष और युद्ध के प्रतीकों में ढाल दिया जाता है, जैसे परीक्षा योद्धा, चुनाव योद्धा, यहां तक कि कोरोना योद्धा भी। और यही सोच हमारे देवी-देवताओं पर भी लागू कर दी जाती है। इसलिए राम, कृष्ण, शिव और दुर्गा को प्रायः हथियारों से सुसज्जित, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है। जबकि हिंदू धर्म में देवता केवल योद्धा नहीं हैं, बल्कि संगीत, नृत्य और गायन के माध्यम से सौंदर्य और सृजन के प्रतीक भी हैं। यही विशेषता हिंदू धर्म को अनेक अन्य धार्मिक परंपराओं से अलग और विशिष्ट बनाती है। भारत में हिंदू धर्म का बौद्ध और जैन धर्मों पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित होने के पीछे भी यह एक कारण माना जा सकता है। बौद्ध और जैन परंपराएं संयम, त्याग और कठोर अनुशासन को जीवन का आधार मानती हैं। इन धाराओं में शांति, स्थिरता और गहन चिंतन को सर्वोच्च मूल्य दिया जाता है। इन धर्मों में ऐसी मान्यता है कि संगीत और नृत्य का आनंद राजा या गौण जीव लेते हैं, जबकि श्रेष्ठ जीव इनसे दूर रहते हैं। इसके विपरीत हिंदू परंपरा में कला को जीवन से अलग नहीं, बल्कि जीवन का ही उत्सव माना गया है। यह अंतर धार्मिक स्थलों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जैन मंदिरों और बौद्ध स्तूपों में अधिकांश श्रद्धालु मौन साधना, ध्यान या जप में लीन दिखाई देते हैं। वहीं हिंदू मंदिरों में जप के अलावा गीत, कीर्तन और नृत्य के दृश्य आम हैं। हिंदू त्योहारों में भी केवल युद्ध में विजय का नहीं, बल्कि देवताओं के विवाह, जन्म और जीवन की विविध भावनात्मक तथा रोमांचक घटनाओं का भी उल्लासपूर्वक स्मरण किया जाता है। हिंदू आख्यानों में लगभग सभी देवता किसी न किसी वाद्य से जुड़े हुए हैं। सरस्वती के हाथों में वीणा है। विष्णु शंख और बांसुरी के साथ चित्रित होते हैं, जबकि शिव के हाथ में डमरू शोभा पाता है। मान्यता है कि हनुमान भी श्रेष्ठ संगीतकार हैं, जो मजीरा बजाकर राम की स्तुति में गीत गाते हैं। कहा जाता है कि उनके गायन में ऐसी शक्ति है कि उससे बर्फ तक पिघल जाती है। शिव को नटराज अर्थात नृत्य के देवता कहा गया है और कृष्ण नटवर हैं यानी नृत्य से प्रेम करने वाले। इनके नृत्य को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान का माध्यम माना गया है। उनके प्रत्येक भाव और मुद्रा में वेदों का सार झलकता है। भरत के नाट्य-शास्त्र में ऋग्वेद के स्तोत्र, सामवेद का संगीत, यजुर्वेद के भाव और अथर्ववेद के ज्ञान का समन्वय दिखाई देता है। कहते हैं कि एक दिन शिव ने देवी से प्रेरणा लेकर वीणा का निर्माण किया। जब उन्होंने उसका मधुर स्वरों में प्रयोग किया, तब विष्णु द्रवित होकर गंगा के रूप में प्रवाहित हुए। नारद मुनि को भी उत्कृष्ट संगीतज्ञ माना गया है। स्वर्ग में किन्नर गाकर, गंधर्व वाद्य बजाकर और अप्सराएं नृत्य के माध्यम से देवताओं का मनोरंजन करती हैं। वहां संगीत और नृत्य की प्रतियोगिताएं भी होती हैं, जिनमें मुनि और राजा निर्णायक की भूमिका निभाते हैं। नाट्य-शास्त्र के अनुसार देवता स्वयं नृत्य और संगीत का आनंद लेने के लिए एकत्र होते हैं। इसी कारण मंदिरों में उन्हें संगीत, गायन, नृत्य और विविध कलाएं अर्पित की जाती हैं। कृष्ण का एक नाम रंगनाथ स्वामी भी है, जिसका अर्थ है कलात्मक सौंदर्य से प्रेम करने वाला। प्राचीन काल के समाजों में राजा भूमि दान करते थे। इस भूमि से प्राप्त आय से मंदिरों में देवताओं का पोषण और मनोरंजन होता था। भूमि का दान अंग-भोग कहलाता था, जो पुजारियों के लिए होता था, जबकि भूमि से होने वाली आय रंग-भोग कही जाती थी, जिससे देवदासियों, संगीतकारों, गायकों, नर्तकियों, कलाकारों, जुलाहों, माला और सुगंध बनाने वालों तथा जौहरियों का जीवन चलता था। मध्य पूर्व के अब्राहमी धर्मों में संगीत और नृत्य प्रायः वर्जित माने गए हैं, लेकिन दरगाहों में कव्वाली की अनुमति होती है, क्योंकि वह खुदा की तारीफ में गाई जाती है। इस प्रकार इस्लाम में कला सीमित है, किंतु हिंदू धर्म में कला को आध्यात्मिक अनुभव का अनिवार्य अंग माना गया है। आज के समय में हिंदुत्ववादी राजनीति हिंदू देवताओं के केवल आक्रामक रूप को उभारने में रुचि दिखाती है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने देवताओं को लेकर यह रेखांकित करें कि वे केवल युद्ध के प्रतीक नहीं, बल्कि सौंदर्य, संवेदना और सृजनशीलता के प्रतिनिधि भी हैं। वे कला के उपासक ही नहीं, स्वयं महान कलाकार भी हैं और यही हिंदू परंपरा की वास्तविक आत्मा है।



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