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- Rajdeep Sardesai Column: India More United Than Political Perceptions
5 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
जो बात विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से शुरू हुई थी, उसने अब एक कहीं अधिक विवादास्पद प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है। इसके साथ ही वह चिंता भी फिर से सिर उठाने लगी है, जिसे भारत लंबे समय से संतुलित करने की कोशिश करता रहा है : उत्तर और दक्षिण में विभेद!
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने चेतावनी दी है कि यदि दक्षिणी राज्यों को नुकसान पहुंचाने वाला कोई कदम उठाया गया, तो अभूतपूर्व आंदोलन भड़क सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने भी इसी तरह की बात कही है। क्या ये राजनीतिक अतिशयोक्तियां हैं? या किसी गहरी संरचनात्मक चिंता का संकेत? असहज कर देने वाला उत्तर है : दोनों।
संख्याओं से शुरुआत करें। पिछले पांच दशकों में उत्तरी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि, दक्षिण की तुलना में कहीं अधिक तेज रही है। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवार नियोजन में निवेश किया, जिससे उनकी जनसंख्या-वृद्धि समय रहते स्थिर हो गई। हिंदी पट्टी का बड़ा हिस्सा इस प्रक्रिया में पीछे रह गया।
यदि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण सख्ती से जनसंख्या के आधार पर किया जाता है- जैसा कि संविधान में परिकल्पित है- तो 2026 की जनगणना के बाद लोकसभा में दक्षिण की हिस्सेदारी घटना लगभग तय है। यही जनसांख्यिकीय वास्तविकता भी है। लेकिन परिसीमन अवैध नहीं है।
यह समान प्रतिनिधित्व के लोकतांत्रिक सिद्धांत- एक व्यक्ति, एक वोट- पर आधारित है। संसदीय सीटों की संख्या की फ्रीजिंग हमेशा से अस्थायी समझौता था, कोई स्थायी व्यवस्था नहीं। देर-सबेर, प्रतिनिधित्व को जनसंख्या में आए बदलावों के अनुरूप होना ही था। वास्तविक समस्या कहीं और है : राजनीति में, और विश्वास में।
जब गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा सीटों में राज्यों के बीच 50 प्रतिशत की समान वृद्धि का विचार रखा, तो वह एक व्यावहारिक समझौते की आधारशिला बन सकता था। यह कि कुछ ऐसी व्यवस्था की जाए कि किसी क्षेत्र को निरपेक्ष रूप से नुकसान न हो। लेकिन यह प्रस्ताव देरी से आया और प्रतिक्रियात्मक लगा। जबकि इतने बड़े फैसले में सहमति और विश्वसनीयता, सभी तक धैर्यपूर्वक पहुंच बनाकर ही निर्मित होती है।
यदि पहले से सभी दलों के साथ परामर्श- विभिन्न क्षेत्रों के मुख्यमंत्रियों को शामिल करते हुए किया गया होता, तो विश्वास और साझा भागीदारी का माहौल बन सकता था। इसके बजाय, अभी तो यह धारणा उभरती है कि फैसले पहले तय किए गए और बाद में उनकी रूपरेखा प्रस्तुत की गई। संघीय व्यवस्था में धारणा की बड़ी ताकत होती है। एकतरफा निर्णयों की धारणा दक्षिण की इस गहरी चिंता को और बढ़ाती है कि संख्यात्मक रूप से प्रभावशाली उत्तर भारत समय के साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को अपने हिसाब से ढाल सकता है।
फिर भी, इसे उत्तर बनाम दक्षिण के एक सरलीकृत द्वैत में समेट देना कोई बहुत चुस्त विश्लेषण नहीं होगा। जहां एक ओर दक्षिण राजनीतिक हाशिये पर जाने की आशंका से चिंतित है, वहीं दूसरी ओर उसने चुपचाप अन्य क्षेत्रों में अपना प्रभाव मजबूत किया है। आर्थिक रूप से, दक्षिणी राज्य भारत के विकास के इंजन हैं- वे जीडीपी, निर्यात और कर-राजस्व में अनुपातहीन रूप से अधिक योगदान देते हैं। बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर वैश्विक इनोवेशन-नेटवर्कों से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि संसद जनसंख्या को प्रतिबिम्बित करती है, तो अर्थव्यवस्था बढ़ती हुई क्षमता को- और इस मोर्चे पर दक्षिण आगे है।
सामाजिक संकेतक भी यही कहानी कहते हैं। साक्षरता, स्वास्थ्य सेवा और मानव विकास के मामलों में दक्षिण देश के बड़े हिस्से से लगातार बेहतर प्रदर्शन करता है। अब वह एक विरोधाभास का सामना कर रहा है : क्या उसे औरों से आगे निकलने का दंड अपनी राजनीतिक ताकत खोकर भुगतना चाहिए?
भारत की वास्तविकता सुस्पष्ट क्षेत्रीय विभाजनों को स्वीकार नहीं करती। सांस्कृतिक और सामाजिक एकीकरण उन तरीकों से गहराता है, जिन्हें राजनीति अकसर नजरअंदाज कर देती है। उदाहरण के लिए, रांची के एमएस धोनी को चेन्नई में लगभग भक्तिभाव जैसा समर्थन मिलता है।
या फिर आरआरआर जैसी फिल्म अखिल भारतीय सफलता अर्जित करती है। इसमें माइग्रेशन के प्रवाह को भी जोड़ दें- दक्षिण के तकनीकी केंद्रों में उत्तर भारतीय और उत्तर में काम करने वाले दक्षिण भारतीय पेशेवर- तो जो तस्वीर उभरती है, वह उस भारत की है, जो राजनीतिक धारणाओं के उलट कहीं अधिक परस्पर जुड़ा हुआ है।
क्या हम जनप्रतिनिधित्व का ऐसा कोई हाइब्रिड मॉडल नहीं विकसित कर सकते, जो जनसंख्या के साथ-साथ किसी राज्य की परफॉर्मेंस, उसके राजकोषीय योगदान या उसके मानव-विकास को भी स्वीकार करे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









