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भागदौड़ और सोशल मीडिया के दौर में ‘रिश्तों में सीमाएं’ तय करने की बात हर जगह सुनाई देती है। लोग मानते हैं कि इससे थकान, मानसिक तनाव और रिश्तों की कड़वाहट खत्म हो जाएगी, लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर लोग सीमा या मर्यादा का मतलब ही गलत समझ लेते हैं। नतीजा यह होता है कि रिश्ते सुधरने की बजाय और बिगड़ जाते हैं। अमेरिका की रिलेशनशिप थेरेपिस्ट मीना बी और फैमिली थेरेपी विशेषज्ञ डॉ. नाइला वॉरेन के अध्ययन बताते हैं कि लोग अक्सर सीमाओं को दूसरों के बर्ताव पर काबू पाने या उन्हें सुधारने का तरीका मान लेते हैं। जबकि हकीकत में सीमा तय करने का मकसद सामने वाले को बदलना नहीं, बल्कि खुद के बर्ताव पर काबू पाना है। अनुरोध और हद को मिला देना सबसे बड़ी गलती मीना बी. के मुताबिक, रिश्तों में सबसे आम गलती ‘अनुरोध’ को ही ‘हद’ समझ लेना है। अनुरोध वह होता है, जिसमें आप सामने वाले से कुछ बदलने को कहते हैं, लेकिन उस पर आपका नियंत्रण नहीं होता। हद या सीमा वह फैसला है, जो आप खुद लेते हैं और जो पूरी तरह आपके हाथ में होता है। उदाहरण के तौर पर, पारिवारिक बातचीत में पड़ोसी से यह कहना कि वे निजी मामलों में दखल न दें- यह एक अनुरोध है। लेकिन अगर वे उसी विषय पर दोबारा बात करें और आप वहां से उठकर चले जाएं, तो यह आपकी तय की हुई सीमा है। डॉ. नाइला वॉरेन कहती हैं, ‘हम दूसरों की सोच या बर्ताव नहीं बदल सकते। हम सिर्फ यह तय कर सकते हैं कि खास हालात में हमारा जवाब क्या होगा। हम कितना सहेंगे और कब तक सहेंगे- यही असली सीमा है।’ डॉ. नाइला के मुताबिक, तरीके से तय की गई सीमाएं रिश्तों में दूरी नहीं, बल्कि सुरक्षा और भरोसा बढ़ाती हैं। इससे सामने वाले को भी यह साफ संकेत मिलता है कि आप खुद का सम्मान करते हैं। मजबूत रिश्तों के लिए उपयोगी हो सकते हैं ये 5 नियम 1. हर बात बोलकर बताना जरूरी नहीं: कुछ सीमाएं बिना घोषणा के भी लागू की जा सकती हैं, जैसे रात 9 बजे के बाद फोन न उठाना। 2. सीमा दोहराने से न हिचकें: अगर कोई भूल रहा है, तो शांति से कहें, ‘मैं इस बारे में पहले ही साफ कर चुका हूं।’ 3. छोटी बातों से शुरुआत करें: दुकान में मुफ्त सैंपल मना करने जैसी छोटी आदतें आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। 4. मिलाजुला संकेत न दें: अगर आपने कहा है कि खास दिन बात नहीं करेंगे, तो पालन करें। 5. असहजता को स्वीकारें: सीमा तय करना कभी-कभी असहज होता है, इसलिए पहले खुद को शांत करें। याद रखें- रिश्ते तब नहीं टूटते जब ‘ना’ कहते हैं। रिश्ते तब टूटते हैं, जब खुद की हद भूल जाते हैं।
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