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साहित्य के इतिहास में एक खूब जाना-माना वाक्य है- ‘द पास्ट इज अ डिफ्रेंट कंट्री, दे डु थिंग्स डिफ्रेंटली देयर’ (‘अतीत एक अलग देश है, जिसका अपना भूगोल है, अपने रीति-रिवाज हैं’)। 1953 में हार्टले द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘द गो-बिटवीन’ का यह पहला वाक्य है। यहां अतीत को दूसरा देश कहकर शायद हमें बताया जा रहा है कि हम भूतकाल को वर्तमान के नजरिये से न देखें। क्योंकि तब समय स्पेस बन जाता है, इतिहास भूगोल बन जाता है। हम समय को तीन हिस्सों में बांटते हैं- भूत, वर्तमान और भविष्य। यह एक बहते समंदर को तीन हिस्सों में बांटने की तरह है, जो हमारी सुविधा के लिए किया जाता है। क्या हम अपनी पिछली जिंदगी को वर्तमान से अलग कर सकते हैं? क्या उसकी छाया वर्तमान पर नहीं पड़ती? इसी बात पर मेरी चर्चा सुमित्रा मेहरोल से हुई। सुमित्राजी दलित महिला हैं, जिनकी आत्मकथा ‘टूटे पंखों से परवाज तक’ हमारी चर्चा का विषय था। सुमित्राजी की जिंदगी में तीन स्तरों पर चुनौतियां थीं- विकलांग होना, दलित होना और स्त्री होना। एक चौथा स्तर भी जोड़ा जा सकता है- आर्थिक तकलीफों का। आत्मकथा में जब सुमित्रा अपने शैशवकाल की बात करती हैं और अवहेलना, धिक्कार से भरे जीवन के बारे में बताती हैं, तो पाठकों का मन द्रवित हो उठता है। आज वे सफल लेखिका हैं, पढ़ाती हैं, घर है और उनके बच्चे भी कामयाबी के पथ पर हैं। ऐसे में उस अतीत से उनका क्या रिश्ता है, जो दु:खों से भरा हुआ था? यह सोचते मुझे ख्याल आया कि आत्मकथा तब लिखी जाती है, जब हम दु:खों से जूझकर बाहर निकल आते हैं, उनमें गर्क नहीं होते। समय हम पर हावी नहीं होता, उसको हम पीछे छोड़कर उसकी जकड़ से निकल जाते हैं। अतीत विलीन नहीं हो जाता, उसके डरावने दानव अभी भी हमारे वर्तमान के दरवाजों पर दस्तक देते हैं, पर अब हम इतने सक्षम हो चुके होते हैं कि तय कर सकते हैं उन दानवों को कितनी देर घर में बिठाना है। यहां मैं ऐसे ट्रॉमा की बात कर रही हूं, जो सुमित्रा और छोटे-बड़े अंश में कई लोगों की जिंदगी का हिस्सा है। हादसों से भरा अतीत एक भूगोल नहीं बनता, पर एक थका हुआ दानव जरूर बन जाता है, जिसका खौफ कम होने लगता है। ऐसे में जीवन को साहित्य का स्वरूप देकर आत्मकथा, उपन्यास वगैरह लिखे जाते हैं, खासतौर पर उनके द्वारा, जो हमेशा हाशिए पर रहे हों। यह तो अतीत की बात है, लेकिन मुझे आत्मकथा के स्वरूप में भी रुचि है। यदि मैं ‘आत्मकथा’ को केवल स्वयं द्वारा लिखी जीवनी के रूप में नहीं, बल्कि आत्म की कहानी के रूप में समझूं, तो कई नए पहलू खुल जाते हैं। गांधीजी ने आत्मकथा को शायद इसी रूप में समझा था- आत्म का विकास। शायद इसीलिए जब उनसे कोई शुभचिंतक कहता है कि हम लोग आत्मकथाएं नहीं लिखते, सिर्फ पश्चिमी देशों के लोग लिखते हैं तो वे जवाब देते हैं, मैंने कब कहा आत्मकथा लिख रहा हूं, मैं तो सिर्फ सत्य के प्रयोगों की बात कर रहा हूं। इससे जाहिर होता है कि गांधीजी का मंसूबा अपनी भौतिक पहचान को न लेकर अपनी अंदरूनी यात्रा के बारे में था। पाश्चात्य देशों से आए इस साहित्यिक रूप का गांधीजी ने रूपांतर किया था और यह अंतरात्मा से वार्तालाप करने का एक बहाना भी बना। एक और चीज पाश्चात्य देशों से भिन्न है और यह फर्क भी आत्मकथा के बारे में सोचते हुए मैं समझी हूं। क्या हम खुद की कहानी ऐसे लिख सकते हैं, जिसमें हम सिर्फ अकेले हों? हमारी जिंदगी कई लोगों से जुड़ी हुई है, चाहे वे अपने हों, पसंदीदा लोग हों या नहीं। हमारा ‘सेल्फ’ एक अकेला टापू नहीं है, जिसके इर्द-गिर्द कोई और नहीं हो। मुझे याद है कि कोविड महामारी के दरमियान मेरी मां बौखलाई हुई थीं। वे मुश्किल से तीसरी क्लास तक पढ़ी हुई हैं और उसके पास वक्त काटने के साधन नहीं थे। मैंने उनसे कहा, आप के जो मन में आए, अपने बारे में लिखो। उन्होंने शुरुआत की किन्तु तुरंत ही छोड़ दिया। उनका कहना था वे उनकी और मेरी आत्मकथा लिख रही थीं, फिर लगा कि उन्हें सब बातें नहीं बतानी हैं। आत्मकथा तो सिर्फ एक व्यक्ति की होती है, तो उनकी और मेरी आत्मकथा का क्या मतलब हुआ? तब मुझे लगा कि हमारे जीवन के अनुभव और साहित्य-स्वरूप एक-दूसरे से सहमत नहीं हैं। जिस समाज में परिवार से बाहर हमें अपनी कल्पना तक न हो, वहां आत्मकथा सिर्फ अपनी नहीं हो सकती। रामानुजन एक कविता में कहते हैं, ‘मैं सब जैसा दिखता हूं सिवाय अपने जैसा।’ अपनी तस्वीर ढूंढते हुए कई बार हम पूर्वजों के हस्ताक्षर पाते हैं। आत्मकथा की यही विडम्बना है- उसके रूप की अपेक्षा जीवन के अनुभव से भिन्न है। क्या हम खुद की कहानी ऐसे लिख सकते हैं, जिसमें हम अकेले हों? हमारी जिंदगी कई लोगों से जुड़ी हुई है, चाहे वे अपने हों, पसंदीदा लोग हों या नहीं। हमारा ‘सेल्फ’ एक अकेला टापू नहीं है, जिसके इर्द-गिर्द कोई और नहीं हो।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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