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वजन कम करना और उसे बनाए रखना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है। अमेरिका में लगभग हर पांच में से दो व्यक्ति मोटापे का शिकार हैं। दशकों से हमें यही सिखाया गया है कि हम खाने का ‘बहुत ज्यादा आनंद’ लेते हैं, इसलिए जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। लेकिन क्या होगा अगर यह धारणा ही पूरी तरह गलत हो? हालिया शोध और विशेषज्ञों की राय है कि असली समस्या शायद यह नहीं है कि हम भोजन का आनंद ज्यादा ले रहे हैं, बल्कि यह है कि हम इसका पर्याप्त आनंद नहीं ले रहे हैं। मैकगिल यूनिवर्सिटी की न्यूरोसाइंटिस्ट डाना स्मॉल कहती हैं,‘हमारे मस्तिष्क में खाने के संकेतों के लिए दो अलग-अलग रास्ते काम करते हैं। इसमें पहला ‘हाई रोड’ है, जो सीधे तौर पर मुंह के स्वाद, भोजन की सुगंध व उसके वास्तविक आनंद से सक्रिय होता है। दूसरा रास्ता ‘लो रोड’ कहलाता है, जो असल में डोपामाइन का मार्ग है और खाना निगलने व पचने के बाद सक्रिय होता है। चिप्स या कोल्ड ड्रिंक जैसे फूड अक्सर इसी ‘लो रोड’ को सक्रिय करते हैं। ये भले ही बहुत स्वादिष्ट न हों, पर इनमें कैलोरी व वसा का ऐसा सटीक मिश्रण होता है जो मस्तिष्क को तीव्र ‘डोपामाइन हिट’ देता है। स्मॉल का तर्क है कि ऐसी स्थिति में हम भोजन के असली आनंद के लिए नहीं, बल्कि इसी रासायनिक प्रभाव की लत के कारण बार-बार खाते हैं। डाना ने प्री-डायबिटिक होने पर उबाऊ खाने के बजाय ‘अधिकतम आनंद’ का रास्ता चुना। उन्होंने ताजी रसभरी और हल्दी, जीरा व लहसुन से बनी सब्जियों जैसे स्वादिष्ट व स्वस्थ भोजन को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि भोजन का आनंद लेने से मस्तिष्क संतुष्ट रहता है, जंक फूड की इच्छा कम होती है। उन्होंने इस प्रयोग से 20 किलो वजन घटाकर डायबिटीज को मात दी।
पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के डॉ. एजेकील इमानुएल कहते हैं,‘वेलनेस का मतलब केवल खुद को रोकना नहीं है।’ यदि जीवन का उद्देश्य सिर्फ इच्छाएं मारना होगा, तो इच्छाशक्ति जल्द जवाब दे देगी। स्वस्थ रहने का नया मंत्र अब ‘कम खाना’ नहीं, बल्कि ‘बेहतर व स्वाद लेकर खाना’ है। अगली बार खाएं, तो कैलोरी गिनने के बजाय स्वाद का लुत्फ उठाएं। शायद यही वह संतुष्टि है जिसकी आपके शरीर को तलाश है।’ ऑटोपायलट मोड में खाते हैं तो स्वाद महसूस नहीं कर पाते ब्रैडफोर्ड और ब्राउन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों का कहना है कि जब हम टीवी देखते हुए या फोन चलाते हुए ‘ऑटोपायलट’ मोड में खाते हैं, तो हम स्वाद महसूस करना भूल जाते हैं। ‘माइंडफुल ईटिंग’(सजग खान-पान) इस बात पर जोर देती है कि भोजन की सुगंध और बनावट पर ध्यान दें। डॉक्टर जेन चोजेन ‘वन-बाइट-एट-ए-टाइम’ तरीका सिखाती हैं। जैसे- हर कौर को पूरी तरह चबाना और स्वाद को संज्ञान में लेना… क्योंकि पेट से मस्तिष्क तक ‘तृप्ति’ का संकेत पहुंचने में लगभग 20 मिनट लगते हैं। धीरे खाने से आप जरूरत से पहले ही रुक जाते हैं।
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