![]()
फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के 25 साल पर चर्चाओं का दौर है। उनके समर्थक जश्न मना रहे हैं। उनके मंत्रिमंडल ने उनकी प्रशंसा का प्रस्ताव पास किया है। आलोचक भी सार्वजनिक जीवन में उनके 25 साल के सफर का विश्लेषण कर रहे हैं, लेकिन निर्ममता से। दो सप्ताह पहले इस कॉलम में हमने कहा था कि भारत में हर सत्ताधारी के कार्यकाल का तीसरा साल सबसे मुश्किल भरा रहा है। यह साल आते-आते जैसे चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो जाता है, थकान उभरने लगती है, महत्वाकांक्षी उत्तराधिकारी अपनी धार तेज करने लगते हैं। उस कॉलम में हमने यह भी कहा था कि इनमें से आखिरी बात मोदी पर लागू नहीं होती है। लेकिन वे अपने इस कार्यकाल के तीसरे साल में बाकी सभी चुनौतियों से रू-ब-रू हैं। उनका मंत्रिमंडल लड़खड़ा रहा है। योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस और हिमंत बिस्वा सरमा को छोड़ उनके बाकी सभी मुख्यमंत्री तमाम चुनौतियों से निपट नहीं पा रहे हैं। लोकप्रिय जनमत के बाजार में प्रतियोगी और परस्पर विरोधी धारणाओं की भरमार है। मोदी-भाजपा की कहानी अभी भी सबसे उल्लेखनीय बनी हुई है, हालांकि यह पहले जितनी जोरदार नहीं रह गई है। मोदी के तीन लुभावने, और अब तक अजेय साबित होते रहे सूत्र 2014 के बाद से पहली बार कड़ी परीक्षा का सामना कर रहे हैं। ये हैं : हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद; विस्तृत आकार लेता जनकल्याण कार्यक्रम, जिसे कुशलता से, न्यूनतम प्रतिरोध या ‘लीकेज’ के साथ लागू किया जाता रहा है; और सबकी आंखों के सामने ठोस इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण। और यह सब भ्रष्टाचार से अछूता रहा है! ये सूत्र अब भी कायम हैं। फर्क यह आया है कि दूसरी बातें उभर आई हैं। हम केवल ‘जेन-जी’ की ही बात नहीं कर रहे। तमाम तरह के इन फैक्टर्स को अलग-अलग देखें तो वे छोटे दिख सकते हैं। लेकिन जब वे एक साथ उभरते हैं तो वह तस्वीर चिंतनीय हो जाती है। क्या मोदी का सामना ऐसी ही तस्वीर से हो रहा है? आइए, कुछ तथ्यों पर गौर करें : 1. चुनाव आयोग की विश्वसनीयता में नाटकीय गिरावट और चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता पर बढ़ता संदेह।
2. व्यापक होती यह धारणा कि शीर्ष न्यायपालिका अस्पष्ट आदेश जारी करती है।
3. एक रिटायर्ड अधिकारी (सुभाष चंद्र गर्ग) ने जीडीपी के सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर देशव्यापी बहस की शुरुआत करा दी।
4. भारतीय रिजर्व बैंक ने भविष्यवाणी कर दी कि महंगाई तीन वर्षों के अपने उच्चतम स्तर को छूने वाली है और रुपया भारी संकट से जूझ रहा है, बावजूद इसके कि भारतीय बैंकों ने अपनी जमा राशि में बढ़ोतरी करने का महंगा मगर सफल प्रयास किया है।
5. दो चुनाव आयुक्तों ने सीईसी के फैसलों से असहमति दर्ज कराने को अखबारी मुकदमा शुरू किया।
6. विपक्षी दल, खासकर राहुल गांधी दिल्ली की घेराबंदी करने में सफल रहे, और सुर्खियों में आ गए।
7. रातोरात उभरी सीजेपी ने नीट से लेकर सरकारी स्कूलों की बदहाली तक का एजेंडा तय कर दिया।
8. चिराग पासवान ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर अपने ही गठबंधन वाली बिहार सरकार की आलोचना कर दी। और उनसे भी छोटे सहयोगी ओम प्रकाश राजभर ने यूपी को छोटे राज्यों में बांटने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री से अपनी कथित बातचीत का खुलासा किया, जबकि योगी आदित्यनाथ इस विचार के सख्त खिलाफ हैं।
9. सरकार की छवि तो निर्णय लेने वाली हुकूमत की मानी जाती है, लेकिन हमने उसकी यह निर्णयहीनता भी देखी कि चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन करें कि न करें या संसद के उस सत्र का क्या करें, जिसका अनिश्चितकाल के लिए स्थगन करने के दो महीने बाद भी सत्रावसान नहीं किया गया है। भाजपा जो संविधान संशोधन चाहती है, उसके लिए बहुमत जुटाने के लिए आत्मविश्वास की कमी दिखलाई देती है। 10. मंत्रिमंडल में फेरबदल या खाली पदों को भरने में असमंजस या लंबी हिचक भी साफ दिखती है। कई मंत्रालयों में मंत्रियों की नियुक्ति अपेक्षित है।
11. शेयर बाजार निरंतर घाटे में है, जबकि अमेरिका से लेकर यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ही नहीं, पाकिस्तान तक दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेजी रही है। चुनौतियों को कबूलने की अनिच्छा इसलिए आत्मघाती बन जाती है, जब लाखों की आबादी वाला मध्यवर्ग अपनी बचत को ‘एसआईपी’ में डाल रहा है, जिसका सरकार स्वागत कर रही है। यह विदा होते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सुनहरी विदाई देने जैसा भी है। 12. और अंत में, भारत के लिए ऐसी वैश्विक स्थिति बनी है, जैसी कई दशकों में नहीं बनी थी। ट्रम्प ने भारत के लिए कई क्षेत्रों में रणनीतिक विकल्प सीमित कर दिए। वे रणनीतिक स्वायत्तता के हमारे दावे को भी हर दिन नई चुनौती देते हैं। ट्रम्प के अलावा यूक्रेन-रूस युद्ध, जलता पश्चिम एशिया, उत्तेजित एनर्जी बाजार और पाकिस्तान के लिए खुली नई रणनीतिक खिड़की भी जोड़ें। और ये सब कमजोर मानसून के बाद है! मानसून पर तो किसी भी सरकार का बस नहीं है, लेकिन ये असंतोष उस साल में उभर रहे हैं, जो कृषि के लिहाज से औसत से नीचा रहेगा। लेकिन बड़े मसलों की जड़ें उन तीन सबसे बुनियादी फैक्टर्स में निहित हैं, जिन्होंने भारत को बीते दशकों में एकजुट और मजबूत बनाया है। ये हैं : संविधान में भरोसा और यह धारणा कि इसे कोई भी नहीं रद्द कर सकता; न्यायपालिका की निष्पक्षता; और चुनाव आयोग की स्वायत्तता। ये तीनों आज दबाव में हैं। भाजपा के विरोधियों से ज्यादा खुद भाजपा यह जानती है कि 2024 में उसे अपने मझोले स्तर के उन नेताओं, खासकर अयोध्या से भाजपा उम्मीदवार के इस बयान से कितना नुकसान पहुंचा कि उनकी पार्टी को संविधान बदलने के लिए सिर्फ 400 सीटों की जरूरत है। ज्यादातर भारतीयों ने न तो संविधान पढ़ा है और न ही उसमें किए गए 106 संशोधनों को पढ़ा है, लेकिन वे संविधान को एक धर्मग्रंथ से कम नहीं मानते। यह न्यायपूर्ण है, धर्मनिरपेक्ष है और नागरिकों का अधिकार-पत्र है, जिसे बदलने की छूट वे किसी को नहीं देंगे। संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की निरंतर चर्चाओं ने भी इन संदेहों को फिर से उभार ही दिया है। जनता की तीन मान्यताएं…
आज के तमाम फैक्टर्स को अलग-अलग देखें तो वे छोटे दिख सकते हैं। लेकिन जब वे एक साथ उभरते हैं तो तस्वीर चिंतनीय हो जाती है। इनकी जड़ में जनता की तीन मान्यताएं हैं- संविधान में भरोसा और यह धारणा कि इसे कोई भी रद्द नहीं कर सकता; न्यायपालिका की निष्पक्षता; और चुनाव आयोग की स्वायत्तता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link







