टिपण्णी

शेखर गुप्ता का कॉलम: नेतन्याहू हारे नहीं इसलिए ‘जीत’ गए हैं

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एक दशक से एक-दूसरे के ‘दोस्त’ ट्रम्प और नेतन्याहू पश्चिम के उदारवादियों और वामपंथियों की निंदनीय लोगों की लिस्ट में अव्वल नंबर पर आने की होड़ लगाते रहे हैं। इनके पतन की ख्वाहिश और भविष्यवाणी की जाती है, लेकिन ये निंदकों को निराश करते रहते हैं। ट्रम्प दो बार चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने। नेतन्याहू गत 17 में से 16 वर्ष सत्ता में रहे, सिवा 2021-22 के जब दो पूर्व प्रधानमंत्रियों- नफ्ताली बेनेट व यायर लैपिड ने उनके खिलाफ गठजोड़ कर लिया था। इस बार चुनाव में नेतन्याहू को फिर से जनादेश तो नहीं हासिल हुआ, लेकिन सबसे ज्यादा सीटें मिलीं और धुर दक्षिणपंथियों का समर्थन उन्हें हासिल है। वे गठबंधन करने की बेहतर स्थिति में हैं। या वे जोड़तोड़ करके दोबारा चुनाव करवा सकते हैं, जो कि इजराइल में कोई असामान्य बात नहीं है। नेतन्याहू की ‘जीत’ इसलिए मानी जाएगी, क्योंकि उन्हें हराया नहीं जा सका है। हमास की ‘कृपा’ से उन्होंने इजराइल को पूरी तरह बदल दिया है। उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट ने अगर अरब पार्टियों से हाथ मिलाया होता तो बहुमत पा जाते। लेकिन अब कोई भी यहूदी समूह हमास को आतंकवादी घोषित किए बिना अरबों से हाथ नहीं मिला सकता। अरब पार्टियां भी ऐसा नहीं कर सकतीं, और न करेंगी। और ऐसा कोई गठबंधन इजराइल के अरब नागरिकों का समर्थन खोए बिना नहीं बन सकता। नेतन्याहू और हमास ने इजराइल में इसी तरह का बदलाव ला दिया है। इजराइल में अब कोई ‘मध्यमार्ग’ नहीं है। अमेरिका में भी डेमोक्रेटिक पार्टी कुछ संतुलन बहाल कर सकती है, लेकिन इससे वह हकीकत नहीं बदल जाएगी, जिसने ट्रम्प को सत्ता दिलाई। प्रवासियों, व्यापार और मानवाधिकार के मसलों पर ट्रम्प ने जिस तरह अपनी छाप छोड़ी है, वह लंबे समय तक रहेगी। ट्रम्प-नेतन्याहू के जलवे को समझने के लिए हमें यह कबूल करना पड़ेगा कि वोटर अब दिमाग की जगह दिल से फैसले लेते हैं, विचारधारा की जगह लेन-देन वाले समीकरण को ज्यादा तरजीह देते हैं। तो वे किस तरह की ‘डील’ चाहते हैं? उनके लिए अर्थव्यवस्था महत्व रखती है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्व वे इन तीन मुद्दों को देते हैं : राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत सुरक्षा और अपनी पहचान। अमेरिका में ट्रम्प ने कानून-व्यवस्था, प्रवासियों और ‘अतिवादी’ राजनीतिक शुद्धता यानी शिक्षा जगत में ‘विविधता-समता-समावेश’ के प्रति झुकाव, स्त्री-पुरुष समानता, और सीमाओं के खुलेपन जैसे मुद्दों पर दूसरा चुनाव जीता। अश्वेतों के पक्ष में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन और गाजा के सवाल पर उदारवादी समूहों के आक्रोश ने ट्रम्प की मदद ही की। तब सवाल उठा कि इन मुद्दों पर श्वेत अमेरिकी और तमाम हिस्पैनिक लोग किस पर भरोसा करेंगे? ट्रम्प पर या कमला हैरिस पर? राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत सुरक्षा और पहचान जैसे मुद्दों के मुकाबले दूसरे मुद्दे मामूली और गौण माने जाते हैं।
इजराइल की कथा अनंत है। वहां एक ही मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया और वह था राष्ट्रीय सुरक्षा। उनके लिए ‘होलोकास्ट’ (यहूदियों के नरसंहार) के बाद 7 अक्टूबर 2023 को हुआ हमला ही सबसे यातनादायी है। इसके अलावा, पिछले करीब तीन दशकों से ईरान ने ‘रिंग ऑफ फायर’ (आग के घेरे) या ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (प्रतिरोध की धुरी) से उनकी घेराबंदी कर रखी है। अंतहीन लड़ाइयों ने इजराइलियों को सख्त बना दिया है। लेकिन 7 अक्टूबर पहला मौका था, जब यहूदी आबादी ने अपने ही गढ़ में खुद को अपनी रक्षा करने में x1x1असमर्थ पाया था। इसने इजराइल को बदल दिया। इसने उसे आगे की लड़ाई के लिए तैयार किया और नेतन्याहू को सरकार विरोधी आक्रोश से बचा लिया। भारत समेत तमाम लोकतंत्रों में जो ठेठ उदारवादी बहस चलती है, उसके विपरीत इजराइलियों की तर्कवादी, लोकतांत्रिक परंपरा गहरी रही है। वहां एक मजबूत, उदार और मुखर समूह रहा है, जो फिलिस्तीनियों से सहानुभूति रखता है, वेस्ट बैंक में आकर बसे लोगों की हिंसा से नफरत करता है और एक ही क्षेत्र में ‘दो देश’ के विचार तक का समर्थन करता है। वर्षों से मैं जिस इजराइली अखबार ‘हारेत्ज’ का पाठक हूं, वह भारतीय मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले ज्यादा वामपंथी झुकाव वाला है। यह अखबार नेतन्याहू का घोर आलोचक रहा है और ऐसी खोजी खबरें देता रहा है, जो उन्हें भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती थीं। इसने ऐसी खबरें भी दी कि नेतन्याहू ने 7 अक्टूबर के हमले के बारे में मिस्र और यूएई की पूर्व चेतावनी की किस तरह अनदेखी की। इजराइल में चल रही बहसों में साजिशों की बातें उछालना कोई नई बात नहीं है। दूसरी ओर ऐसी धुर कट्टरपंथी पार्टियां भी हैं, जो वेस्ट बैंक और गाजा से सभी फिलिस्तीनियों को निकाल बाहर करना चाहती हैं। संक्षेप में कहें तो इजराइली समाज में गहरे मतभेद मौजूद हैं, लेकिन व्यक्तिपूजा का स्वभाव उनमें नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि इन मतभेदों ने चुनाव को प्रभावित नहीं किया। इजराइलियों ने दो कट्टरवादियों में से एक को चुना। सवाल सीधा-सा था : इस भयावह रूप से असुरक्षित दौर में हम अपनी सुरक्षा के लिए किस पर ज्यादा भरोसा करें? नेतन्याहू ने जनरल गादी आइजेनकोट को आईडीएफ का चीफ नियुक्त किया था; उनका फौजी बेटा गाजा में लड़ते हुए मारा गया; और खुद वे हमास का खात्मा करने का संकल्प ले चुके हैं। काफी लोगों ने बदलाव का खतरा मोल लेने की जगह मौजूदा सरकार को ही बनाए रखने के पक्ष में वोट दिया। इजराइल में अरब मतदाताओं का मजबूत वोट बेअसर क्यों रह जाता है? बताया जाता है कि 11 सीटें जीतने वाले गुट ने नजारेथ के अपने मुख्यालय में फिलिस्तीनी प्रतीकों के साथ जीत का जश्न मनाया। वे 7 अक्टूबर की ‘निंदा’ करते हैं, लेकिन इसे या हमास को आतंकवाद नहीं कहते। कोई यहूदी पार्टी उन्हें गले नहीं लगाएगी। इसलिए उनकी सीटों का कोई महत्व नहीं रह गया है। यह किसी भी चुनावी लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के लिए एक सबक है। अलग-थलग रहना उनके लिए शायद ही फायदेमंद है। उन्हें मुख्यधारा में जो स्वीकार्य लगते हैं उनके साथ जुड़ना चाहिए और गठबंधन करना चाहिए। इसके लिए वैचारिक समझौता करने की जरूरत पड़ेगी। अन्यथा वे हाशिये पर रह सकते हैं, इजराइली अरबों की तरह। राष्ट्रवाद की परीक्षा का प्रश्न
इजराइल में मुस्लिम अरबों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है। वे सरकारी सेवाओं, व्यवसायों और सेना तक में काम कर रहे हैं। रिकॉर्ड मतदान करके उन्होंने 120 सीटों वाली संसद में 19 सीटें जीती हैं, लेकिन उन्हें कोई भी साथ नहीं लेना चाहेगा। इजराइल के व्यापक परिदृश्य में वे राष्ट्रवाद की परीक्षा में फेल हो जाते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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