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- Maharashtra Urban Body Polls: BJP Dominates Mumbai BMC Election Results
3 घंटे पहले
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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार
बीएमसी के चुनाव नतीजे बताते हैं कि भारतीय राजनीति में भाजपा का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। भाजपा धीरे-धीरे पीएम मोदी के उस कथन को पूरा करने की ओर बढ़ रही है कि पार्टी का लक्ष्य पंचायत से संसद तक- हर चुनाव जीतने का होना चाहिए। भले ही भाजपा सभी राज्यों में सत्ता में न हो और न ही उसने बहुत ज्यादा राज्यों के निकाय चुनाव जीते हों, लेकिन फिलहाल वह 20 राज्यों में अकेली या गठबंधन के जरिए सत्ता में है। महाराष्ट्र नगरीय निकाय चुनावों में दूसरे दलों या गठबंधनों को सूपड़ा तो साफ नहीं हुआ, लेकिन 29 निकाय चुनावों में भाजपा की सफलता केंद्र और राज्य की सत्ता में भागीदारी के अनुपात में ही रही।
बीएमसी चुनाव कई कारणों से अहम हो गया था। पहला, मुम्बई देश की सबसे उलझी हुई शहरी सियासत की जंग का मैदान बना था। अभूतपूर्व गठबंधन बने। शिव सेना (यूबीटी) और मनसे के मेल से ठाकरे बंधु फिर एक हो गए। नतीजतन, कांग्रेस ने महाराष्ट्र विकास अघाड़ी से अलग होकर वंचित बहुजन अघाड़ी से गठबंधन किया।
एनसीपी (अजित पवार) ने महायुति से बाहर होकर अकेले चुनाव लड़ा। भाजपा और शिव सेना (शिंदे) ने अपना गठबंधन बनाए रखा, इसके बावजूद दोनों में संगठनात्मक वर्चस्व को लेकर सियासी टकराव दिखा। इन नए समीकरणों में वोटरों के सामने विकल्प चुनना बेहद कठिन हो गया था।
कुल 2869 सीटों पर हुए चुनाव में अकेली भाजपा ने 1420 सीटें जीतीं, जबकि शिंदे सेना ने 375 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस 329 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आई। उसकी गठबंधन सहयोगी वंचित बहुजन अघाड़ी को 40 सीटें मिलीं। ठाकरे बंधुओं के गठबंधन में उद्धव ठाकरे की शिव सेना को 175 सीटें मिलीं, जबकि राज ठाकरे की मनसे महज 13 सीटें जीत सकी।
अकेले चुनाव लड़ी अजित पवार की एनसीपी को 160 सीटें मिलीं, जबकि शरद पवार की एनसीपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। उसे सिर्फ 40 सीटें ही मिल पाईं। 29 में से 25 नगर परिषदों में भाजपा अकेले या सहयोगियों के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरी। इनमें से 18 में भाजपा ने अकेले ही बहुमत हासिल किया।
महाराष्ट्र निकाय चुनावों ने राजनीति के एक जटिल फॉर्मेट को उजागर किया, जिसमें हर कोई हर किसी के साथ भी था और खिलाफ भी। सबसे अनोखा री-यूनियन उद्धव और राज का था, जो दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, लेकिन भाजपा-शिंदे सेना के वर्चस्व के खिलाफ एकजुट हो गए। साझा चुनावी रैलियों ने इस गठबंधन ने मराठी अस्मिता और बालासाहेब की विरासत को उभारने की कोशिश की, लेकिन भाजपा-शिंदे गठबंधन का गणित बिगाड़ने में नाकाम रहा।
कांग्रेस को लगा धक्का लंबे समय से चले आ रहे उसके पतन और फिर उठ खड़ा होने में उसकी असमर्थता को ही बताता है। बीएमसी चुनावों में कांग्रेस को 24 सीटें मिलीं, जबकि 2017 में हुए पिछले चुनाव में वह 31 सीटें जीती थी। यह उल्लेखनीय है कि 2007 में उसने 75 सीटें जीती थीं, जो 2012 में 52 और 2017 में 31 रह गईं। जबकि कांग्रेस को उम्मीद थी कि वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ गठबंधन में वह दलित-मुस्लिम मतों को साथ जोड़कर भले बहुमत न पा सके, लेकिन 2017 से बेहतर प्रदर्शन तो कर ही लेगी।
इन चुनावों ने एक तरीके से बीएमसी में उद्धव के नेतृत्व वाली शिव सेना के दबदबे पर भी सवालिया निशान लगाया है। बीएमसी भारत का सबसे अमीर नगर निगम है, जिसका बजट 70 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक है। यूबीटी शिव सेना ने बीएमसी की 227 में से 65 सीटें जीतीं, लेकिन अपनी सहयोगी मनसे के कमजोर प्रदर्शन से उसे नुकसान उठाना पड़ा। मनसे 6 ही सीटें जीत पाई। ऐसे में इस गठबंधन के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या यह आगे भी चलेगा या यह सिर्फ बीएमसी के लिए था?
इन नतीजों से बड़ा संदेश मिलता है कि बहुदलीय मुकाबले में गठबंधन की भूमिका अहम होती है, क्योंकि इससे दलों को अतिरिक्त समर्थन जुटाने में मदद मिलती है, लेकिन गठबंधन भी एक सीमा तक ही चुनावी सफलता दिला सकते हैं। दूसरे, जिस समाज में वोटर अपनी मौलिक पहचानों को ज्यादा अहमियत देते हैं, वहां अस्मिता की राजनीति बनी रहेगी।
ऐसे में सियासी दल जाति, क्षेत्र, धर्म और भाषा जैसी पहचानों के जरिए मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश करते रहेंगे, लेकिन इनसे मिलने वाले लाभों की भी एक सीमा है। गठबंधन और अस्मिता की सियासत से ऊपर चुनावी सफलता की असल कुंजी तो वोटरों से विकास का वादा और उसका स्पष्ट रोडमैप प्रतीत होता है। आज का आकांक्षी वोटर इसे ही अहमियत भी देता है।
वोटरों ने मराठी अस्मिता की आक्रामक राजनीति को खारिज किया। गैर-मराठी मतदाताओं ने भाजपा-शिंदे गठबंधन को पसंद किया, क्योंकि वह मराठी मानुष, उत्तर भारतीयों और अन्य समुदायों के बीच संतुलन बनाने में सफल रहा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








