पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  ईश्वर से मिलने के लिए कुछ समय भीतर जाना ही पड़ेगा
टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: ईश्वर से मिलने के लिए कुछ समय भीतर जाना ही पड़ेगा

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जो हर जगह गूंज रहा है, उस दिव्य शक्ति, परमात्मा को समेटना ही भजन बन जाता है। भजन का सच्चा अर्थ यही है कि इसको करने वाला और सुनने वाला ध्वनि बन जाता है, मनुष्य नहीं रह जाता। जब ऐसा होता है तभी भजन का असली आनंद है। सच्चे भजन के लिए किसी ऑर्केस्ट्रा की आवश्यकता नहीं पड़ती। कई लोगों ने तो बिना वाद्ययंत्र के भी सुंदर भजन गा दिए। उनकी आवाज बाहर सुनाई देती है, लेकिन ऐसे लोग बहुत गहरे अपने भीतर उतर चुके होते हैं। भगवान के लिए कहा जाता है कि जो हर जगह दिख रहा है, वो भीतर के नेत्रों से सही देखा जाता है। चूंकि आजकल बाहर के नेत्रों के प्रयोग तो इतने अधिक वैज्ञानिक हो गए कि पूरी दुनिया देखी जा सकती है, पर दुनिया बनाने वाला देखना हो तो भीतर ही उतरना पड़ेगा। अब तो वर्तमान में जीने की सुविधा के नाम पर मेटा-चश्मों का भी प्रयोग खूब चल पड़ा। ऐसे प्रयोगों के कारण मनुष्य अत्यधिक बाहर रहने लगा, जबकि ईश्वर से मिलने के लिए कुछ समय तो भीतर जाना ही पड़ेगा।



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