सुपरहीरो का रोल करते हुए खुद से जूझती रही अभिनेत्री:  महिलाओं को दर्द झेलना सिखाया जाता है; ज्यादा सहन करते रहना ताकत नहीं है
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सुपरहीरो का रोल करते हुए खुद से जूझती रही अभिनेत्री: महिलाओं को दर्द झेलना सिखाया जाता है; ज्यादा सहन करते रहना ताकत नहीं है

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महिलाओं को हमेशा दर्द झेलना सिखाया जाता है। मैंने भी दो साल तक ऐसा ही किया।’ ये शब्द अमेरिकी अभिनेत्री एरिन मोरियार्टी के हैं। ओटीटी सीरीज ‘द बॉयज’ में सुपरहीरो बनीं एरिन असल जिंदगी में अपने ही शरीर से लड़ रही थीं। डॉक्टर कभी डिप्रेशन, कभी एंग्जायटी, कभी बाइपोलर डिसऑर्डर बताते रहे, पर असली बीमारी छिपी रही। एक वक्त तो लगने लगा कि मौत ही राहत दिलाएगी। फिर पता चला- यह ग्रेव्स डिजीज थी। अब एरिन बता रही हैं, उन्होंने इससे कैसे मुकाबला किया… सितंबर 2023 के आसपास ये सब शुरू हुआ। तब मैं 29 साल की थी। मुझे लगातार ऐसी थकान महसूस होती, जो मेरे काम के बोझ की तुलना में असामान्य थी। हालत इतनी बिगड़ी कि अलार्म के बावजूद मैं सोती रह जाती। वीकेंड पर 19 घंटे तक सोना आम हो गया। मूड स्विंग्स तेज हो गए। हाथ-पैर सुन्न रहने लगे और सबसे डरावना था सोचने-समझने की क्षमता में गिरावट। छोटे डायलॉग भी याद नहीं रहते। लक्षण बढ़ते गए, भरोसा टूटता गया डॉक्टरों ने पोस्ट बर्थ कंट्रोल सिंड्रोम, बाइपोलर डिसऑर्डर, एंग्जायटी, क्लिनिकल डिप्रेशन जैसी कई आशंकाएं गिनाईं। मुझे लगता था कि इनमें से कोई भी सही नहीं है। जैसे-जैसे लक्षण बढ़े, मेरा खुद पर भरोसा टूटता गया। उसी समय मैं ‘द बॉयज’ में सुपरहीरो स्टारलाइट का किरदार निभा रही थी। यह मेरे लिए सिर्फ अभिनय नहीं था। दो साल बाद पता चली बीमारी मुझे न्यूरोलॉजिस्ट के पास भेजा गया। तब तक मैं मौत के लिए भी तैयार हो चुकी थी। मई 2025 में डॉक्टर का एक ईमेल आया- ‘हमारे पास जवाब है। मैं आपकी मदद कर सकता हूं।’ कई जांचों के बाद पता चला कि मुझे ग्रेव्स डिजीज है, एक ऑटोइम्यून बीमारी, जो सक्रिय थायरॉयड से जुड़ी है। मानसिक आघात ने घेरा: लेकिन सही निदान भी आघात को मिटा नहीं सका। इलाज शुरू होने के महीनों बाद गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट के कारण मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। तब समझ आया कि बीमारी सिर्फ शरीर में नहीं रहती; वह आपकी सोच, पहचान, रिश्तों और मानसिक स्थिरता तक पहुंच जाती है। मैं पहले सहते रहने को ताकत मानती थी। अब समझती हूं कि सहनशक्ति हमेशा अच्छी सेहत नहीं होती। मैं चाहती हूं कि कम से कम एक व्यक्ति अपने शरीर की आवाज समय रहते सुन ले। शरीर चीखने से बहुत पहले बोलता है।



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