दोस्ती में मंदी:  तीन चौथाई युवा दोस्त होने पर भी अकेलापन महसूस कर रहे, अधिक ‘कनेक्टेड’ होने के बावजूद करीबी दोस्तों की कमी
अअनुबंधित

दोस्ती में मंदी: तीन चौथाई युवा दोस्त होने पर भी अकेलापन महसूस कर रहे, अधिक ‘कनेक्टेड’ होने के बावजूद करीबी दोस्तों की कमी

Spread the love




कभी दोस्ती का मतलब था घंटों साथ बैठना, बिना वजह मिलना और छोटी-बड़ी हर बात साझा करना। आज तस्वीर बदल गई है। मोबाइल में सैकड़ों कॉन्टैक्ट हैं, सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स हैं, दर्जनों वॉट्सएप ग्रुप हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से साथ देने वाले दोस्त कम होते जा रहे हैं। यही वजह है कि आज की पीढ़ी पहले से कहीं अधिक ‘कनेक्टेड’ होने के बावजूद खुद को अकेला महसूस कर रही है। वर्चुअल फ्रेंड हैं, लेकिन वास्तविक दोस्तों की कमी हो रही है। सामाजिक दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। समाजशास्त्रियों ने इस स्थिति को ‘फ्रेंडशिप रिसेशन’ यानी ‘दोस्ती में मंदी’ का नाम दिया है। चेन्नई के डॉन बॉस्को संस्थान द्वारा 24 राज्यों में 15-29 वर्ष के युवाओं पर किए सर्वे में 75% (तीन चौथाई) लोगों ने माना कि दोस्तों से घिरे रहने के बावजूद वे खुद को अकेला महसूस करते हैं। लगभग 80% युवाओं ने कहा कि भावनात्मक संकट में वे परिवार से पहले दोस्तों का सहारा लेते हैं, लेकिन यही दोस्ती अब पहले जैसी गहरी नहीं रह गई है। सर्वे करने वाले फादर जॉन अलेक्जेंडर कहते हैं आजकल युवाओं के 20 से 30 दोस्त होते हैं, लेकिन जब सार्थक एवं गहन मित्रता की बात आती है, तो कोई नहीं मिलता। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया का हर छठा व्यक्ति अकेलेपन का शिकार है और यह समस्या हर साल 8.7 लाख से अधिक मौतों से जुड़ी हुई है। वर्चुअल और प्रोफेशनल दोस्त बढ़े, लेकिन अपनापन घटा क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पायल चौरसिया के मुताबिक, इसके पीछे कई सामाजिक और तकनीकी बदलाव जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण है सोशल मीडिया का भ्रमित करने वाला जुड़ाव। ऑनलाइन बातचीत से संपर्क तो बना रहता है, लेकिन भावनात्मक गहराई नहीं बन पाती। लाइक, कमेंट और स्टेटस अपडेट वास्तविक बातचीत की जगह नहीं ले सकते। दूसरा कारण है तेजी से बदलती जीवनशैली। पढ़ाई, नौकरी और करियर के लिए युवाओं का लगातार नए शहरों में जाना पुराने दोस्ती के दायरे को तोड़ देता है। नई जगह पर संबंध बनाना आसान नहीं होता। इसके अलावा वर्क फ्रॉम होम, लंबा स्क्रीन टाइम, व्यस्त दिनचर्या और रिश्तों के लिए समय की कमी भी दोस्ती को कमजोर कर रही है। विशेषज्ञ: मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए हर फ्रेंड जरूरी होता है कई स्टडीज में कहा गया है कि अकेलापन स्मोकिंग की तरह ही खतरनाक होता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए सैकड़ों परिचितों की नहीं, बल्कि तीन-चार भरोसेमंद दोस्तों की जरूरत होती है। आज की सबसे बड़ी चुनौती दोस्त ढूंढना नहीं, बल्कि दोस्ती निभाना है। लोगों में बढ़ते अकेलेपन और दोस्तों की कमी को विज्ञापन जगत और ब्रांड भी महसूस करते हैं तभी तो ‘हर एक फ्रेंड जरूरी होता है’ जैसी पंच लाइन हिट होती हैं। करीबी दोस्त न होने की बात कहने वाले चार दशक में पांच गुना तक बढ़ गए अमेरिकन पर्सपेक्टिव्स सर्वे के अनुसार, 1990 में 3% लोग ऐसे थे जिनका कोई करीबी दोस्त नहीं था। अब यह संख्या चार से पांच गुना बढ़ गई है। 1990 में करीब 33% लोगों के पास 10 या उससे ज्यादा गहरे दोस्त थे। आज ऐसे लोग केवल 13% बचे हैं। हार्वर्ड के शोधकर्ताओं के अनुसार, पहले लोग हफ्ते में औसतन 6.5 घंटे दोस्तों के साथ बिताते थे, जो अब घटकर 4 घंटे या उससे भी कम रह गया है। यूगव के एक सर्वे में हर 4 में से 1 भारतीय ने कहा था कि उसका कोई दोस्त नहीं है। समाधान: दोस्ती को वर्चुअल नहीं बल्कि वास्तविक बनाना होगा इस बढ़ती समस्या का समाधान भी हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में छिपा है। विशेषज्ञों के मुताबिक सप्ताह में एक बार दोस्तों से आमने-सामने मिलने की आदत, किसी हॉबी, खेल या बुक क्लब से जुड़ना, बातचीत के दौरान मोबाइल को अलग रखना और केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने के बजाय वास्तविक संवाद बढ़ाना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *