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तर्क का अंत हो गया है। बुद्धि थक गई है। राजनीति की निर्णय-क्षमता पंगु हो गई है। इसलिए, सिर्फ इसलिए, हठ पर विजय नहीं मिल पा रही। एक वीरप्पन सालों-साल लोगों को मारता रहता है और राजनीति यह होने देती है। नक्सलवादी हमें भीतर तक चीरते रहते हैं, और सरकारें यह देखती रहती हैं। राजनीति की मजबूरी यह है कि राज करने के अंग्रेजों के तरीके को वह 67 साल में भी छोड़ नहीं पाई, बल्कि वह जकड़कर बैठ गया है। अंग्रेजों का तरीका देखिए- अपने साम्राज्य को स्थापित करने के लिए उन्होंने जिन टुकड़ों को ठोंक- पीटकर एक किया था, बाद में उसी साम्राज्य को बचाने के लिए वे उन्हीं टुकड़ों को बांटने लगे। उन्होंने ध्येय बनाया कि केवल अंश, सिर्फ टुकड़े ही वास्तविक हैं। समग्र, संपूर्ण तो महज गढ़ी हुई कल्पना है। हमारे तंत्र ने इसके इतर कभी कुछ सोचा ही नहीं। क्योंकि ऐसा सोचना भी उसके लिए नुकसानदायक है, वह यही सोचता रहा।
दरअसल, लचर राजनीतिक प्रणाली के चलते यहां- वहां उग आए प्रगतिवादियों ने हमें अपनी जड़ों से बेरहमी से काटा। मार्क्स और लेनिन के लेखन को आत्मसात कर लेने के बाद, अपने आप को कायल करने के उपरांत कि आप अपने लोगों, उनके अतीत और उनकी जीवनशैली की कितनी तीखी से तीखी भर्त्सना कर सकते हैं, यही इस बात का पैमाना है कि आप कितने मुक्त हो चुके हैं, कि लक्ष्य के प्रति आप कितने समर्पित हैं। इन प्रगतिशीलों ने मिशनरियों द्वारा फैलाई गई भर्त्सनाओं को न सिर्फ आगे बढ़ाया, बल्कि कई गुना प्रचंडता से उन्हें उकसाया। दरअसल इनके सामने एक लुभावनी संभावना थी कि अपने आपको शोषित महसूस करके ये तबके जब क्षुब्ध, उत्तेजित होंगे, तब उनसे अनुयायी निकल कर आएंगे। यही हुआ भी। अनुयायी निकलकर जरूर आए, लेकिन अतिरेक यह हुआ कि ये तथाकथित प्रगतिशील और वे टुकड़े जिन्हें इन्होंने उकसाया था, निर्दोष, निरपराधों को मारने, गोलियों से छलनी कर देने के पीछे भी न्याय देखने को तत्पर हो गए।
राजनीति में आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने हित देखकर जो विपक्ष पहले इकट्ठा हुआ था, कभी भाजपा के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ! कभी कांग्रेस के नेतृत्व में भाजपा के खिलाफ। वही विपक्ष कालांतर में अपनी क्षेत्रीयता के सवाल पर बिखर गया। अब फिर लामबंद होने की कोशिश कर रहा है। उसी भाजपा के खिलाफ जिसके नेतृत्व में वह कभी इकट्ठा हुआ था। दूसरी तरफ वही भाजपा जो कभी सबको इकट्ठा करती हुई दिखाई दे रही थी, आज सबको बिखेरने में लगी हुई है। आप पार्टी के सात सांसदों ने अपनी पार्टी को कह दिया कि हम आपके “सात’ नहीं। आखिर भाजपा का दामन थाम लिया। उधर बंगाल में तृणमूल के चुनाव हारते ही उसके कोई बीस सांसद पार्टी छोड़कर पके सेब की तरह भाजपा की झोली में आ टपके। ममता दीदी को काटो तो खून नहीं। उन्हें लग रहा है जैसे छाती पर 1947 के दंगों वाली वो ट्रेन चढ़ गई है, जिसमें सवार होकर कई सालों तक निरीह दर्द अपनी ओर आता रहा था। बेचारी ममता अपने ही लोगों की आंखों से गिर गई थीं। किसी तरह फिर से उठना चाह रही थीं लेकिन पार्टी के विभाजन के शूल ने कमर ही तोड़ दी। अब टूटी कमर के साथ वापस कौन उठकर खड़ा हो सका है भला? यही वजह है कि कभी विपक्षी नेताओं की एकता बैठक में राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए जो ममता हर बार बैठक का बहिष्कार करते नहीं थकती थीं, वही अब ऐसी बैठकों में सबसे पहले अपनी उपस्थिति दर्ज कराते देखी जा रही हैं। दरअसल, भाजपा राजनीति की बेहद चतुर खिलाड़ी है। दो बार तमिलनाडु में अन्नामलाई को आगे करके मात खाने वाली भाजपा ने जब यह देखा कि एक थलपति विजय अपने दम पर सरकार बना सकता है और भाजपा जैसा हिंदी नाम तमिलनाडु में नहीं चल सकता तो उसने अपने अन्नामलाई को स्वतंत्र कर दिया। कुछ लोग समझ रहे होंगे कि अन्नामलाई भाजपा से किसी नाराजगी के कारण अलग हो गए हैं, लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं लगती। दरअसल, अन्नामलाई की अलग पार्टी भी भाजपा की ही एक शाखा समझिए। जब कभी जो भी सफलता अन्नामलाई की झोली में आएगी, गिरेगी भाजपा के पक्ष में ही। जहां तक विपक्षी एकता का सवाल है, उसमें अब भी कोई दम नजर नहीं आता क्योंकि राज्यों में इनके अपने हित होते हैं। कभी एक-दूसरे के पक्ष में और कभी एक-दूसरे के खिलाफ भी।
बस, पेंच यहीं फंस जाता है। बंगाल में तृणमूल की टूट…
बंगाल में तृणमूल के हारते ही उसके कोई बीस सांसद पके सेब की तरह भाजपा की झोली में आ टपके। ममता दीदी को काटो तो खून नहीं। उन्हें लग रहा है जैसे छाती पर 1947 के दंगों वाली वो ट्रेन चढ़ गई है, जिसमें सवार होकर कई सालों तक निरीह दर्द अपनी ओर आता रहा था।
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