देवदत्त पट्टनायक3 घंटे पहले
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लगभग 2,500 वर्ष पहले बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसके बाद बुद्ध के लगभग समकक्ष महिमा वाली एक देवी के उदय में करीब 1,000 वर्ष लग गए। उससे पहले बौद्ध साहित्य में धन की देवी ‘श्री’ ही एकमात्र प्रमुख देवी थीं, जिनका कला में भी चित्रण मिलता है। लेकिन समय के साथ बौद्ध देवगण में एक देवी की उपस्थिति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। तारा देवी का उदय इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप हुआ।
बौद्ध देवगण में तारा के प्रवेश की प्रक्रिया भी धीरे-धीरे पूरी हुई। कहा जा सकता है कि इसकी शुरुआत गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग 500 वर्ष बाद महायान बौद्ध धर्म के उदय के साथ हुई। इस नए पंथ में बुद्ध की प्रज्ञा के साथ-साथ उनकी करुणा को भी विशेष महत्व दिया जाने लगा। करुणा पर इस नए चिंतन से महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्त्व की अवधारणा विकसित हुई। बोधिसत्त्व बुद्ध का वह स्वरूप था, जो दूसरों की पीड़ा दूर करने के लिए अपने निर्वाण को भी स्थगित कर सकता था। इन विचारों के विकसित होने के साथ बुद्ध को प्रज्ञा और करुणा, दोनों से जोड़ा गया। इन्हीं गुणों के स्त्री रूप में तारा की पूजा आरंभ हुई।
कई मायनों में तारा के इस स्वरूप को वेदों में वाणी की देवी ‘वाच्’, विद्या की देवी ‘सरस्वती’ और जैन धर्म की प्रवचन देवी ‘श्रुतदेवी’ से जोड़ा जाता है। पूर्वी भारत में काली देवी को भी तारा कहकर संबोधित किया जाता है। तांत्रिक साधनाओं में विद्या और शक्ति प्राप्त करने के लिए तारा का आवाहन किया जाता है। इस प्रकार तारा में विद्या और शक्ति, दोनों देवियों के गुणों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
एक स्वतंत्र देवी के रूप में तारा का सबसे प्रारंभिक कलात्मक चित्रण महाराष्ट्र की एलोरा गुफाओं में मिलता है। इन गुफाओं का काल निर्धारण लगभग सातवीं सदी अर्थात आज से करीब 1300 वर्ष पहले का माना जाता है। यहां तारा को ‘श्री’ और ‘पद्मपाणि’ की तरह हाथ में कमल का फूल धारण किए हुए दिखाया गया है। जहां श्री के हाथ का कमल धन का प्रतीक है, वहीं पद्मपाणि के हाथ का कमल प्रज्ञा का प्रतीक माना जाता है।
बौद्ध धर्म के विभिन्न पंथों में तारा की भूमिका भी अलग-अलग है। महायान बौद्ध धर्म में माना जाता है कि तारा बुद्ध की मां हैं। यहां उनका आशय ऐतिहासिक बुद्ध की माता से नहीं है। तारा प्रज्ञा और करुणा की प्रतीक हैं, जिनके माध्यम से साधक बुद्धत्व प्राप्त करता है। इसी कारण महायान बौद्ध धर्म में उन्हें प्रतीकात्मक रूप से ‘बुद्ध की मां’ के रूप में पूजा जाता है। उन्हें बोधिसत्त्व की पुत्री भी माना जाता है। मान्यता है कि संसार का दुख देखकर बोधिसत्त्व की आंखों से आंसू बहने लगे थे और उन्हीं आंसुओं से तारा का जन्म हुआ था।
महायान बौद्ध धर्म में तारा को पांच अमर ध्यानी बुद्धों में से एक अमोघसिद्धि की सहचरी माना जाता है। उन्हें अवलोकितेश्वर नामक बोधिसत्त्व का मूर्त रूप भी माना जाता है। वज्रयान बौद्ध धर्म में तारा को बुद्ध का स्त्री स्वरूप माना जाता है। कभी-कभी उन्हें केवल एक रूपक के रूप में भी देखा जाता है, अर्थात बोधिचित्त की मूर्त अभिव्यक्ति, वह चेतना जिसकी सहायता से कोई साधक बोधिसत्त्व बनता है।
तारा को कभी एकल देवी के रूप में तो कभी दो, चार या इक्कीस देवियों के समूह के रूप में चित्रित किया जाता है। इनमें श्वेत तारा और हरी तारा सबसे प्रसिद्ध स्वरूप हैं। एक मान्यता के अनुसार वे तिब्बत के राजा की चीनी और नेपाली पत्नियां थीं और दोनों ही बौद्ध धर्म को तिब्बत लेकर आई थीं। श्वेत तारा को श्वेत कमल पर आसीन दिखाया जाता है। उनके कुल सात नेत्र होते हैं। एक माथे के मध्य में तथा शेष हथेलियों और तलवों में। इन नेत्रों के माध्यम से वे सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखती हैं। तारा के इन दोनों स्वरूपों को प्रायः राजा के दोनों ओर खड़े हुए दिखाया जाता है। उनके हाथों में कमल के फूल होते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि बोधिसत्त्व दिन-रात पीड़ित लोगों की पुकार सुनते रहते हैं।
हालांकि तारा बौद्ध धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवी हैं, फिर भी वे बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन पंथ थेरवाद बौद्ध धर्म का हिस्सा नहीं हैं। दक्षिण पूर्व एशिया और श्रीलंका में प्रचलित इस पंथ में ऐतिहासिक बुद्ध को ही सर्वोच्च महत्व दिया जाता है।









