राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  क्या कांग्रेस से टूटकर बने दलों को उसमें लौट आना चाहिए?
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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: क्या कांग्रेस से टूटकर बने दलों को उसमें लौट आना चाहिए?

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भारतीय सिनेमा में सीक्वेल शायद ही सफल होते हैं। आमतौर पर दर्शक मूल फिल्म देख चुके होते हैं, नयापन खत्म हो जाता है और कहानी बासी लगने लगती है। इसीलिए ‘इंडिया-2.0’ का फिर से साथ आना बमुश्किल ही यह भरोसा जगाता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित चुनौती देने वाला गठबंधन आसानी से वही प्रदर्शन दोहरा सकता है। पिछले दो वर्षों में बहुत कुछ बदल चुका है। कांग्रेस को कई बड़े राज्यों में चुनावी झटके लगे हैं। गठबंधन की ताकत रहे कई क्षेत्रीय दल कमजोर हो चुके। बंगाल में हार के बाद टीएमसी बिखर रही है। महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) भी टूट चुकी हैं। दिल्ली हारने के बाद आम आदमी पार्टी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की जंग लड़ रही है। ऐसे में ‘इंडिया’ साझा दृष्टिकोण पर साथ आई ताकतों की एकजुटता जैसा कम और 2029 में किसी भी कीमत पर भाजपा को रोकने के लिए बने जमावड़े जैसा ज्यादा लगता है। समस्या यह है कि राजनीति अंकगणित ही नहीं, केमिस्ट्री का भी खेल है। भले गठबंधन बंद कमरों में बनाए जा सकते हों, लेकिन वोटर अवसरवादिता को भांप लेते हैं। दो महीने पहले राहुल गांधी टीएमसी पर भ्रष्टाचार और अंदरखाने भाजपा से समझौता करने का आरोप लगा रहे थे। क्या वही नेता अब एक मंच पर आकर यह उम्मीद कर सकते हैं कि वोटर इन विरोधाभासों को नजरअंदाज कर देंगे? ऐसे विरोधाभास हर जगह हैं। तमिलनाडु में हार के बाद अपनी उपेक्षा को लेकर डीएमके कांग्रेस से नाराज है। आम आदमी पार्टी भी पंजाब में अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के साथ मंच साझा करने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं दिखती। केरल चुनाव में कांग्रेस के हमलों से वामदल भी नाराज हैं। ऐसे में शायद ही यह किसी एकजुट राजनीतिक विकल्प की तस्वीर नजर आती है। इसके विपरीत, भाजपा में स्पष्टता है। वोटर जानते हैं पार्टी के सिद्धांत क्या हैं और अंतिम निर्णय का अधिकार किसके पास है। भाजपा का वर्चस्व इस कारण भी स्थापित हुआ है कि विपक्ष बिखरा हुआ, अनिश्चित और आंतरिक संघर्षों में उलझा नजर आता है। भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प बातों में से एक यह है कि कई मौजूदा क्षेत्रीय दल कांग्रेस से ही निकले हैं। टीएमसी, एनसीपी और वाईएसआर कांग्रेस- इन सभी की जड़ें कांग्रेस में हैं। इनके नेता नेतृत्व विवाद, राजनीतिक महत्वाकांक्षा या क्षेत्रीय मजबूरियों के चलते कांग्रेस से अलग हुए, लेकिन व्यापक रूप से ये दल समान वैचारिक परिवेश का हिस्सा बने हुए हैं। ये पार्टियां आज भी अपने नाम और राजनीतिक पहचान में कांग्रेस की छाप लिए हुए हैं। पिछले चार दशकों में कांग्रेस परिवार कई क्षेत्रीय दलों में बिखर गया। नतीजतन, भाजपा विरोधी वोट बंटते चले गए। तो क्यों न एक और बिखरा हुआ भाजपा-विरोधी गठबंधन बनाने के बजाय कांग्रेस से निकली इन शाखाओं को सियासी तौर पर फिर से संगठित करने के रास्ते तलाशे जाएं? एक विलय, या कम से कम पारस्परिक समन्वय पर आधारित व्यवस्थित एकजुटता चुनाव से चंद महीने पहले बनाए गए किसी नए गठबंधन की तुलना में कांग्रेस को अधिक ऊर्जा दे सकती है। इससे विपक्ष की राजनीति में मजबूत केंद्रीय धुरी बनेगी और कांग्रेस छोटे सहयोगियों से कमजोर स्थिति में नहीं, ताकत के साथ बातचीत कर सकेगी। आज यह विचार अव्यावहारिक लग सकता है। लेकिन राजनीति का इतिहास उम्मीदों के परे लगने वाली ऐसी री-यूनियन की घटनाओं से भरा है। खुद भाजपा ही व्यापक संघ परिवार के दशकों लंबे एकीकरण का परिणाम है। तो कांग्रेस परिवार स्थायी तौर पर विखंडित क्यों रहे? हालांकि, ऐसी किसी सफलता के लिए कांग्रेस को भी बदलना पड़ेगा। क्षत्रपों की वापसी के लिए जरूरी होगा कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता और अधिकार साझा करने की मंशा दिखाए। क्षेत्रीय नेताओं को भी व्यक्तिगत अहंकार, पारिवारिक हितों और अल्पकालिक सियासी गुणा-भाग से ऊपर उठना होगा। यह मुमकिन नहीं कि कोई नेता अपनी दशकों पुरानी पहचान खोकर दिल्ली का महज एक दरबारी बनना चाहेगा, लेकिन यह भी संभव नहीं कि हर क्षेत्रीय नेता अपने घटते जनाधार के बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में ‘किंगमेकर’ बने रहने की उम्मीद करे। एक और बिखरा हुआ गठबंधन बनाने के बजाय कांग्रेस से निकली शाखाओं को सियासी तौर पर फिर से संगठित करने के रास्ते क्यों न तलाशे जाएं? विलय या समन्वय पर आधारित एकजुटता कांग्रेस को अधिक ऊर्जा दे सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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