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एन. रघुरामन का कॉलम: आपका पैक्ड ऑफिस लंच ‘हिडन हंगर’ से बचाने वाला भी होना चाहिए

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

उस दौर में बजट की तंगी के चलते मेरे जैसे और कई दूसरे ऑफिस जाने वाले लोग घर से जल्दी तैयार होने वाला लंच लेकर चलते थे। उसमें ज्यादातर परांठे, रोटी-सब्जी या कर्ड-राइस होते थे। तब हमें नहीं पता था कि इनमें कार्बोहाइड्रेट ज्यादा और न्यूट्रिएंट्स कम होते हैं।

हम यह भी नहीं जानते थे कि फर्मेंटेड फूड होने के कारण कर्ड-राइस अच्छे होते हैं। हर सब्जी का एक ही पार्टनर होता था- आलू, सिवाय उन सब्जियों के, जो भिंडी, ग्वार फली और बीन्स फैमिली की तरह पतली और खूबसूरत दिखती थीं।

तब हम ऑफिस-गोअर्स में यह जोक चलता था कि आलू को इन पतली, हरी रंग की खूबसूरत लड़कियों से प्यार हो गया था और उन सभी ने उसके अजीब आकार के चलते यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया कि ‘तुम जैसे बदसूरत से कौन शादी करेगा?’ शर्मिंदा और निराश हमारे ऑल-टाइम फेवरेट आलू ने उन्हें श्राप दिया कि वे पूरी जिंदगी कुंवारी रहेंगी। इसीलिए आज भी उन्हें अलग से पकाया जाता है, जबकि आलू हर दूसरी सब्जी का पार्टनर बन जाता है।

खैर, मजाक को अलग रखें। आज हममें से ज्यादातर घर का बना खाना ऑफिस ले जाते हैं। इसकी वजह सिर्फ बजट की तंगी नहीं, बल्कि हेल्दी फूड खाने की इच्छा है, क्योंकि मार्केट में अनहेल्दी फूड की भरमार है। यूके में ओकाडो की एक रिसर्च के मुताबिक इसकी एक वजह यह भी है कि ऑफिस के नजदीक लंच खरीदना या फूड डिलीवरी एप से मंगवाना बहुत महंगा हो गया है।

इसी साल अगस्त में यूके के 2126 ऑफिस-गोअर्स पर एक सर्वे हुआ, जिसके नतीजे 14 सितंबर को रिलीज हुए। यह बताता है कि ये वयस्क पैसे बचाने के स्मार्ट और व्यावहारिक तरीके तलाश रहे हैं। इसलिए बाहर खाने-पीने का खर्च कम करने के लिए पैक्ड लंच अपना रहे हैं।

दुनियाभर में ऑफिस वर्कर्स तेजी से पैक्ड लंच की ओर लौट रहे हैं। ऐसा महज इसलिए नहीं कि वे जीवनयापन के बढ़ते खर्च से अपने बजट को बचाना चाहते हैं, बल्कि वे खाने में न्यूट्रिएंट्स भी बढ़ाना चाहते हैं और ‘हिडन हंगर’ नहीं झेलना चाहते। यह कुपोषण का ऐसा रूप है, जिसमें व्यक्ति पेट भरने के लिए पर्याप्त कैलोरी तो लेता है, लेकिन उसकी डाइट में जरूरी विटामिन और मिनरल्स की कमी होती है।

दिखने वाली भुखमरी या गंभीर कैलोरी-डेफिशियंसी के विपरीत यह स्थिति ‘छिपी’ होती है, क्योंकि इसमें अंडरफेड होने के शारीरिक संकेत तत्काल नहीं दिखते। लेकिन समय के साथ यह सेहत और विकास को नुकसान पहुंचाती है।

पैक्ड लंच पॉपुलर हो रहा है। सर्वे के अनुसार 64% युवा ऑफिस-गोअर्स ने इसे अपनाया है। ये युवा एआई के जरिए यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके लंच में वैरायटी बनी रहे, ताकि खाने से बोरियत न हो, लेकिन उसमें प्रोटीन, फाइबर, फैट और दही जैसी जरूरी चीजें भी हों।

अगर आप इन युवा वर्कर्स को देखें तो वे हमेशा नट्स और सीड्स का एक बॉक्स अपने साथ या ऑफिस ड्रॉअर में रखते हैं। मुझे ताज्जुब होता है कि वे कितने प्लान्ड हैं। मुझे बताया गया कि मुट्ठीभर मिक्स्ड नट्स और सीड्स में 200 कैलोरी से कुछ ही कम होती हैं। इनमें 8 से 10 ग्राम प्रोटीन, 2 से 5 ग्राम फाइबर होता है और ये सभी अनसैचुरेटेड फैट होते हैं। कई रिसर्च कहती हैं कि रोजाना नट्स खाने से कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरा 20% तक कम होता है।

प्रोटीन पेट भरा रखता है। 25-30 ग्राम फाइबर हृदय रोगों और टाइप-2 डायबिटीज की दर कम करता है। अच्छे तेल, सीड्स, फ्रूट्स और नट्स गंभीर कार्डियोवैस्कुलर विकारों को घटाने में मदद करते हैं। हमारे पूर्वजों ने त्योहारों के लिए खाने की जितनी वैरायटी तैयार की थीं, उनमें से ज्यादातर मॉडर्न फूड लेबल्स से मेल खाती हैं।

फंडा यह है कि अपने ऑफिस लंच को सिर्फ पैसे बचाने के लिए पैक न करें, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि यह आपको यह ‘हंगर’ और ‘हिडन हंगर’ से भी बचाए।

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