- Hindi News
- Opinion
- AI & Online Platforms Threat Analysis | N Raghuraman Column 911 Impact
9 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
आज से ठीक 25 साल पहले मैं एक एसोसिएट एडिटर था और इस अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल के साथ एक नए प्रोजेक्ट पर करीब से काम कर रहा था। मैं उन्हें प्यार से ‘एसए’ कहता था। शाम का वक्त था। हमने एडिटोरियल मीटिंग अभी खत्म ही की थी, जिसमें तय किया था कि 12 सितंबर के अखबार में क्या-क्या जाएगा।
मैं अपनी कुर्सी पर लौटकर काम करने की तैयारी कर ही रहा था कि एसए मेरे केबिन में आ गए। आमतौर पर वे मुझे अपने केबिन में बुलाते थे। उन्होंने पूछा, ‘क्या तुमने न्यूज देखी?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ वे रुके नहीं, बस मुड़े और बोले कि ‘मेरे साथ चलो।’
मैं पीछे-पीछे उनके केबिन में चला गया। वहां एनके सिंह और श्रवण गर्ग समेत दूसरे वरिष्ठ संपादकों के साथ हमने टीवी स्क्रीन पर घट रही उस भयावह घटना को देखा- वह हमला, जो 21वीं सदी का सबसे घातक टेरेरिस्ट अटैक बनने वाला था।
25 साल बाद आज मुझे एसए का मेरे केबिन से अपने केबिन तक जाना और उनकी चिंता भरी टोन फिर याद आई, जब एंथ्रोपिक के रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने एआई की तेज प्रोग्रेस को लेकर एक डरावनी चेतावनी दी। मंगलवार को उन्होंने चेतावनी दी कि 2030 तक ही एआई मानवता के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकता है।
फिर उन्होंने अपनी जॉब छोड़ दी और जोर देकर कहा कि उनकी चेतावनी कोई ‘मार्केटिंग स्टंट’ नहीं है। कॉक्सन ने ओपनएआई और एंथ्रोपिक, दोनों पर ‘सीधे तौर पर सेल्फ-इम्प्रूविंग सुपरइंटेलिजेंस की होड़ में शामिल होने’ और ‘हमारी जिंदगी के साथ जुआ खेलने’ का आरोप लगाया।
उन्हें डर है कि तेजी से सक्षम होते जा रहे एआई सिस्टम कंप्यूटर नेटवर्क हैक कर सकते हैं, साइंटिफिक रिसर्च कर सकते हैं, संसाधन जुटा सकते हैं और इतने ऑटोनोमस हो सकते हैं कि इंसान उन पर से नियंत्रण खो दें। और शायद उनकी बात में दम भी है। ऐसा मैं सिर्फ यह सोचकर नहीं कह रहा हूं कि एआई आगे चलकर क्या बन सकता है, बल्कि यह देखकर कह रहा हूं कि तकनीक पहले से ही हमारे घरों में क्या कर रही है।
मुझे बच्चों के कमरों में कंबल के भीतर से आती वो धुंधली-सी रोशनी और धीमी-सी हंसी याद है। ये हंसी अकसर सोशल मीडिया पोस्ट पर मिलने वाले लाइक्स और रिएक्शंस से आती थी, जब टीनएजर्स अपने साथियों से तुलना करते थे कि किसे कितने लाइक्स और रिएक्शन मिले। तुरंत एक फायर-शेप्ड आइकन यह बताने को भेज दिया जाता कि ‘मुझे जलन हो रही है।’
उन तमाम रातों को याद कीजिए, जब पैरेंट्स के तौर पर हमें अपने बच्चों के कमरे से हंसी की आवाज आती थी। हम अंदर जाकर पूछते कि ‘रात के 2 बज रहे हैं, अभी तक सोए नहीं?’ ऐसा इसलिए था, क्योंकि जो तकनीक उन्हें आकर्षित कर रही थी, वो इतनी एडिक्टिव थी कि उन्हें एहसास ही नहीं होता था कि जिस वक्त उन्होंने शुरुआत की थी, समय उससे पांच घंटे आगे निकल चुका है।
जो चीज हमें मासूमियत भरी लग रही थी, वह असल में कहीं ज्यादा गहरी थी। टेक्नोलॉजी चुपचाप पूरी एक पीढ़ी के दूसरों से अप्रूवल पाने, खुद की तुलना करने और भावनाओं को कम्युनिकेट करने के तरीकों को बदल रही थी।
यही वजह है कि एआई को लेकर चल रही बहस मुझे चिंतित करती है। खतरा 9/11 की तरह शोर और विनाश लेकर नहीं आएगा। यह चुपचाप आ सकता है- स्क्रीन से स्क्रीन, घर से घर और दफ्तर से दफ्तर तक। फिर अचानक हमें एहसास होगा कि कुछ बुनियादी चीजें बदल चुकी हैं।
इसीलिए अचंभा नहीं कि मेटा भी अगले छह महीनों में टीनएजर यूजर्स के बचाव के लिए नए सुरक्षा उपाय लागू करने पर आगे बढ़ा है। अगर ऐसा हुआ तो पैरेंट्स के तौर पर अंतहीन स्क्रॉलिंग को लेकर हमारी चिंता थोड़ी कम होगी।
क्योंकि, मेटा ने टीनएजर्स के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक पर रोजाना दो घंटे की समय-सीमा लागू करने और आधी रात से सुबह 6 बजे तक एप्स को ब्लॉक करने पर सहमति जताई है। हालांकि, इस दौरान डायरेक्ट मैसेज सुविधा उपलब्ध रहेगी। लाइक्स और रिएक्शन की संख्या को भी ऑटोमैटिकली छिपा दिया जाएगा, ताकि टीनएजर्स अपने और दूसरे की संख्या देख कर तुलना न कर सकें।
फंडा यह है कि जैसे-जैसे दुनिया ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों और एआई की खामियों को लेकर जागरूक हो रही है, हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या ये ताकतवर टूल इंसानियत के लिए अगला 9/11 बन सकते हैं? तबाही आए, इससे पहले हमें तेजी से विचार करना होगा।








