एन. रघुरामन का कॉलम:  दुनिया अपने रेगुलर स्नैक्स में अधिक सेहतमंद विकल्प तलाश रही है
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एन. रघुरामन का कॉलम: दुनिया अपने रेगुलर स्नैक्स में अधिक सेहतमंद विकल्प तलाश रही है

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दुनिया में टेक कंपनियां लगातार हमें स्लीप स्कोर, हार्ट रेट बता रही हैं और हमारी बायोलॉजी को उस डैशबोर्ड जैसा बना रही हैं, जिसे देखकर हम रोजाना चिंता करें। ऐसे में फूड कंपनियां बिना शरीर की बात किए कैसे चुप रहतीं? हमारी बायोलॉजी को आंकड़ों में बदलकर इन टेक कंपनियों ने न सिर्फ सेल्फ-ऑप्टिमाइजेशन को एक आसान और तेजी से बढ़ता बिजनेस बना दिया है, बल्कि वियरेबल डिवाइसेज के बूम को भी हकीकत बना दिया है। किनारे बैठे फूड बिजनेस ने न सिर्फ यह देखा कि टेक्नोलॉजी से आया यह बदलाव पैसा बना रहा है, बल्कि उसने शादीशुदा बेटियों और उनकी मांओं के बीच की बातचीत में आए बदलाव को भी देखा। याद कीजिए, कुछ ही समय पहले जब किसी खास वक्त पर वॉट्सएप कॉल आती तो मांएं जवाब देने के लिए दौड़ पड़ती थीं। क्योंकि वह कॉल उनकी बेटी की होती थी, जो विदेश में या उस शहर में रहती थी, जहां वह शादी के बाद बस चुकी है। बातचीत छोटी होती थी। बेटी पूछती कि किसी खास डिश को कैसे बनाएं और मांएं एआई असिस्टेंट की तरह इसे बता देती थीं। धीरे-धीरे रेसिपी जानने की ये कॉल कम हो गईं। ऐसा इसलिए नहीं कि बेटियां पारंगत हो गईं, बल्कि उनके मुताबिक मां की रेसिपी अब नए जमाने के अनुसार हेल्थ कॉन्शस नहीं रही। वजन घटाने वाली दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के साथ दुनिया विभिन्न कारणों से धीरे-धीरे अपनी डाइट की जांच सीख रही है। सप्लीमेंट्स से लेकर लगभग हर चीज में, आलू के चिप्स तक में प्रोटीन जोड़ना उपभोक्ताओं को लुभाने का तरीका बन गया है। हाल ही में आई मैकिन्से की एक रिपोर्ट में पाया गया कि दुनिया के दो-तिहाई उपभोक्ता अपने नियमित स्नैक्स के ज्यादा हेल्दी विकल्पों के लिए 10% अधिक कीमत चुकाने को तैयार हैं। क्या यकीन करेंगे कि आप एक कुकीज के ही विविध प्रकार खरीद सकते हैं, जो नींद से लेकर उन विभिन्न कार्यों में आपका फोकस बढ़ा सकते हैं, जिनको लेकर आपको लगता है कि उन पर लाइफस्टाइल का असर पड़ता है। आज तक हम सभी ‘प्रोटीन कुकी’ खाते रहे। हम मानते थे कि उसमें पैकेट पर बताई जानकारी के अनुसार फाइबर है। लेकिन अब वही कुकी हमारी बायोलॉजी में अलग जगह ले चुकी है। अब वह कहती है, ‘मुझे खाओ, आप अच्छे-से सो पाओगे।’ या कहती है कि ‘अगर फोकस बढ़ाना चाहते हैं तो ‘फोकस कुकी’ पेश है। इसमें न्यूट्रिएंट हैं, जिन्हें लेकर माना जाता है कि वे ब्रेन परफॉर्मेंस बेहतर करते हैं- जैसे क्रिएटिन। ‘स्लीप कुकी’, जिसमें अमीनो एसिड एल-थियानिन है, माना जाता है कि यह तनाव कम करके नर्वस सिस्टम को शांत करता है। अमेरिका की ऑनलाइन मिलने वाली ‘फील्ड्स गुड पैकेज्ड कुकीज’ ऐसी कई किस्में बेचती है। हालांकि वेलनेस ट्रेंड्स पर काम करने वाले शोधकर्ताओं की इन इन्ग्रेडिएंट्स को लेकर मिली-जुली राय है। मुझे लगता है कि कुकीज का भविष्य उम्र आधारित होने वाला है, जैसे एडल्ट कुकीज और बच्चों की कुकीज। हालांकि दुनिया भर में फूड बिजनेस बड़ी छलांग लगा चुका है। जब कोई व्यक्ति फूड पैकेजिंग की प्लानिंग कर रहा होता है तो कोई दूसरा सोच रहा होता है कि उसमें प्रोटीन, फाइबर या दूसरे फंक्शनल इन्ग्रेडिएंट्स का कॉम्बिनेशन कैसे जोड़ा जाए, ताकि यह हेल्थ कॉन्शस लोगों को आकर्षित कर सके। क्लासिक फूड में फंक्शनल ट्विस्ट देना अब युवा आंत्रप्रेन्योर का नया नियम बन गया है। वे समझ चुके हैं कि दुनिया में ‘परमिसिव इंडल्जेंस’ की भूख कभी खत्म नहीं होने वाली। इसका मतलब है ऐसे ट्रीट्स बनाना, जो भूख शांत करे और उनका ‘हेल्दियर प्रोफाइल’ भी हो, ताकि लोग बिना अपराधबोध के उसका आनंद ले सकें। यह ट्रेंड प्रतिबंधों के बजाय संतुलन पर फोकस करता है। अकसर इसमें 80-20 नियम अपनाया जाता है, जहां 80% पोषक सामग्री होती है और 20% विलासिता से संबंधित। सोचिए कि पारंपरिक लड्डुओं को ‘व्हे लड्डू’ या ‘प्रोटीन पेड़ा’ में बदला जा रहा है, जो पुरानी यादों और पोषण को एक साथ ला रहे हैं। फंडा यह है कि नई जानकारी देने वाली तकनीक और हमारी बायोलॉजी के अलग-अलग हिस्सों को सपोर्ट करने का वादा करने वाला फूड हमेशा ट्रेंड में रहेगा। भविष्य में विज्ञान और हेल्थ के ठप्पे के बिना किसी भी फूड बिजनेस को प्रतिस्पर्धा में संघर्ष करना पड़ सकता है।



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