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पूरा दिन सोफे या बिस्तर पर निकल गया। कोई शारीरिक काम नहीं किया। फिर भी बेहद थकान महसूस हो रही है। अगर ऐसा है तो ये ‘ब्रेन रॉट’ हो सकता है। यह कोई मेडिकल शब्द नहीं और ऑक्सफोर्ड ने इसे दो साल पहले ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ चुना था, लेकिन अब यह दुनिया भर के डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों के लिए चिंताजनक शब्द बन गया है। लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजिस्ट डॉ. वेंडी रॉस कहती हैं, ‘जब हम बिना दिमाग चलाए सिर्फ देखते, सुनते या सोचते रहते हैं, तो दिमाग पर बोझ बढ़ता है। टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन के इस दौर में इंसान को असीमित, लगातार नई जानकारी मिलती रहती है। आसानी से उपलब्ध सूचनाओं के कारण दिमाग सोचना-चिंतन करना बंद कर देता है, लेकिन अतिरिक्त, गैरजरूरी डेटा के बोझ से वह थक जाता है। रील्स, शॉर्ट्स और एआई इस नुकसान को और बढ़ा देते हैं।’ डॉ. रॉस कहती हैं कि ऐसा है तो आपको सचेत हो जाना चाहिए और दिमाग को सक्रिय करने के लिए कुछ अलग तरीकों को आजमाना चाहिए। दिमागी कमजोरी को पलट सकते हैं ‘फोकस ऑन-ऑफ’ के लेखक ऑस्कर डी बॉस के अनुसार, जब हम काम के बीच में ध्यान हटाते हैं तो दिमाग का एक हिस्सा पिछली गतिविधि में ही अटका रहता है। इसे प्रबंधन मनोविज्ञान में ‘ध्यान का भटकाव’ कहते हैं। इससे बचने के लिए जरूरी है कि जो काम कर रहे हैं, उसे पूरा करें। फिर दूसरा काम शुरू करें। ऑस्ट्रेलिया की न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. लीला लैंडोव्स्की बताती हैं कि दिमाग की क्षमता, एकाग्रता बढ़ाने के लिए हफ्ते में 3 बार कठिन कसरत जरूरी है। इसके लिए 10 सेकंड पूरी ताकत से कठिन मेहनत और फिर 20 सेकंड आराम करना होता है। इसे 8 बार दोहराएं। इससे दिमाग की नसों को ताकत मिलती है। आसपास की आवाजों में से किसी एक पर ध्यान टिकाएं दिमाग को तेज रखने के लिए बड़े बदलाव नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में सुधार सबसे ज्यादा काम आता है। डॉ. वेंडी रॉस कहती हैं कि सिर्फ 10 मिनट रुककर आसपास की आवाजों (जैसे घड़ी की टिक-टिक या पक्षियों की कलरव) में से किसी एक आवाज पर ध्यान टिकाएं। इसे ‘अटेंशन मसल’ विकसित करना कहते हैं। इसके बाद अपने तनावों के कारणों को कागज पर लिखकर नाम दें। इससे दिमाग तुरंत तर्कसंगत सोचने लगता है। क्रिप्टिक क्रॉसवर्ड, माइंडफुल वॉक, डिजिटल डिटॉक्स और बार-बार काम बदलने की आदत छोड़ना भी ध्यान और याद्दाश्त को बेहतर कर सकता है।
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