पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  ‘मनचाहा’ और ‘अनचाहा’ के बीच झूलता रहता है जीवन
टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: ‘मनचाहा’ और ‘अनचाहा’ के बीच झूलता रहता है जीवन

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धन मेहनत से आता है, लेकिन समृद्धि अपने साथ दूसरों को धनवान बनाने से भी आती है। जब हम विकास यात्रा में हों तो किसी को पीछे भले छोड़ दें, उसको बर्बाद ना करें। अपने प्रयासों से आगे बढ़ जाएं। जो पीछे रह गया, यदि वो नादान है तो खुद बर्बाद हो जाएगा, लेकिन हमारी नीयत स्वयं को आबाद रखने तक रहे। हम मनुष्यों का जीवन ‘मनचाहा’ और ‘अनचाहा’ के बीच झूलता रहता है। जब ‘मनचाहा’ मिलता है, बावले होने की कोई सीमा नहीं होती। हमने किया, हमने पाया, हमारा है, हम ही सब कुछ हैं- ये मनचाहा मिलने के उद्घोष हैं। लेकिन जब ‘अनचाहा’ जीवन में आता है तो फिर देखिए लोगों की बेचैनी। वो अपने दुर्भाग्य को रोने लगते हैं। अनचाहा दुर्भाग्य नहीं होता, एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती है। इससे निपटने के लिए सबसे बढ़िया शस्त्र हैं- धैर्य, समझ। अपने कारोबार और नौकरी की दुनिया में खूब आगे बढ़िए, दूसरों को बढ़ाइए, लेकिन पाने के चक्कर में सबसे बहुमूल्य जीवन को न खो दें। जीविका और जीवन का संतुलन बनाए रखें।



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