पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  युद्ध अगर हो तो केवल धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: युद्ध अगर हो तो केवल धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए

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इस समय युद्ध के जो दृश्य चल रहे हैं, उसे देख कबीर की एक पंक्ति याद आती है- चींटी चावल ले चली बीच में मिल गई दाल, कहत कबीर दो न मिले एक ले दूजी डाल। एक चींटी चावल का दाना लेकर जा रही थी। रास्ते में दाल मिल गई तो सोचा दाल भी ले चलूं। पर चावल पहले से हो तो दाल कैसे रखेंगे? दोनों लेने के प्रयास में एक भी गया। दो न मिले, एक ले- ऐसा संदेश कबीर देना चाहते हैं। आज हम इसको समझें। बिना सोचे-समझे, निज-हित की कामना से, अहंकार में डूबकर युद्ध आरम्भ हुआ। फिर उलझ गया। अब मध्यस्थ ढूंढ रहे हैं। फिर ऐसी स्थिति बन गई कि अंधे के कंधे पे लंगड़ा चढ़ गया। युद्ध में योद्धा जो भी करें, पर मध्यस्थता की स्थिति आए तो उसका चयन तो ठीक करें। मध्यस्थता तो तीन ही लोगों ने की थी- हनुमान ने, अंगद ने और कृष्ण ने। सामने रावण था, दुर्योधन था। और इन तीनों ने एक बात समझाई- युद्ध अंतिम विकल्प होना चाहिए। पर यदि युद्ध हो ही तो केवल धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए।



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