पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  परिवार बचें और मांओं- बहनों की प्रसन्नता भी बनी रहे
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: परिवार बचें और मांओं- बहनों की प्रसन्नता भी बनी रहे

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बहुत से लोग हैं, जिन्हें बाहर की दुनिया में दूसरे लोगों द्वारा खूब मान दिया जाता है। और ऐसे प्रभावशाली लोग जब घर आते हैं, तो कभी-कभी घर में उन्हें बहुत अपमान मिलता है। ऐसा क्यों हो जाता है? दरअसल परमात्मा चाहता है कि बाहर मिला हुआ मान अभिमान में न बदल जाए, इसलिए घर-परिवार में कुछ अपमान की घटनाएं होती रहनी चाहिए। भारत के पारिवारिक जीवन में सदस्यों के मानसिक हालात बहुत बदल गए हैं। कोई 10-12 साल पहले तक परिवारों में स्त्री और पुरुष के क्रोध का स्तर समान था। लेकिन अभी एक नया दृश्य देखने को मिला है और खासतौर पर कोरोना के बाद महिलाएं पुरुषों के मुकाबले अधिक चिड़चिड़ी हो गईं। ये चिंता का विषय है। और पुरुषों को ही सोचना पड़ेगा कि माताओं-बहनों पर ऐसा क्या अतिरिक्त दबाव बना कि वो बिखर-सी गई हैं, भीतर से टूट गई हैं। भारत की माताएं-बहनें परिवार में इस बात को लेकर स्तुत्य हैं कि वे अपनी पीड़ा को दबा लेती हैं और परिवार बचा लेती हैं। लेकिन अब समय आ गया, परिवार बचें और माताओं-बहनों का आनंद, उनकी प्रसन्नता भी बनी रहे।



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