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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: अच्छा बोलने और सुनने का भी आध्यात्मिक अभियान हो

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6 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

हमारी आत्मा हमसे बात करती है। यह अलग बात है कि हम सुन नहीं पाते। आयुर्वेद विज्ञान कहता है कि जो पंचतत्व प्रकृति में हैं, वही हमारे भीतर हैं। ध्वनि का प्रतिनिधि आकाश है। एक आकाश हमारे भीतर है, एक आकाश बाहर है। जो लोग बाहर के आकाश पर टिकते हैं, उसकी ध्वनि को सुनते हैं- उनको संसार के पदार्थ मिल जाएंगे। लेकिन अगर हम भीतर के आकाश पर टिकें तो हमारा मन शून्य होगा।

हम नाद-ब्रह्म को सुन पाएंगे और हमें अपने ही भीतर बैठा परमात्मा मिलेगा। तो प्रकृति से हम क्या ले सकते हैं यह हमें समझ नहीं आता। जैसे आज भी कई वृद्ध बाजार में जवानी खरीदने निकलते हैं, बचपन उधार लेने निकलते हैं, तो क्या यह मिल जाएगा?

पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु का तो हमने दुरुपयोग कर ही लिया। अब हम ध्वनि प्रदूषण के क्षेत्र में भी प्रवेश कर रहे हैं। ध्वनि का संबंध कहा-सुनी से है। ‘अच्छा बोलें और अच्छा सुनें’ का भी एक आध्यात्मिक अभियान आरंभ होना चाहिए।

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