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जो अपने जीवन के लक्ष्य को नकार दे, नास्तिकता उसके भीतर प्रवेश करने लगती है। कोई यूं ही नास्तिक नहीं हो जाता। जब वो परमशक्ति को प्राप्त करने की चुनौती से मुंह मोड़ता है, तब नास्तिक होता है। ईश्वर की खोज कितनी मायने रखती है- इसे समझना हो तो नास्तिक से पूछिए, आस्तिक नहीं बता पाएगा। क्योंकि नास्तिक बना ही इसीलिए है कि उसने इसे स्वीकार नहीं किया। इसे ठुकरा दिया, मुंह मोड़ लिया। आस्तिक तो सीधी बात करेगा कि मेरा विश्वास है और खोज मैं कर रहा हूं। मैंने चुनौती स्वीकार की है। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने की चुनौती को भक्ति कहते हैं। नास्तिक अपने अहंकार और अज्ञान के कारण घोषणा करता है कि ईश्वर नहीं है। लेकिन आस्तिक कहता है मैंने स्वीकार किया है तो मेरे जीवन का आनंद बढ़ा है। वैज्ञानिक दृष्टि के लोग ईश्वर को नहीं मानते। लेकिन जब उनके जीवन में कठिन परेशानियां आती हैं, तब कोई अदृश्य शक्ति उनको महसूस होती है। आंतरिक खुशी चाहें तो आस्तिकता स्वीकारनी चाहिए।
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