गुणवंत शाह3 घंटे पहले
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भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की गहरी पहचान कराने वाला ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ केवल एक धार्मिक महाकाव्य नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन की धड़कन है। इसकी महिमा को अनेक महापुरुषों ने अपने-अपने ढंग से समझाया है। आचार्य विनोबा भावे का मानना था कि यदि धर्म को समझना हो तो बाइबिल पढ़नी चाहिए और यदि साहित्य के रस का अनुभव करना हो तो शेक्सपियर के नाटकों का अध्ययन करना चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति धर्म की गहराई और साहित्य के रस, दोनों को एक साथ पाना चाहता है तो उसे रामचरितमानस का अध्ययन करना चाहिए। उनके दृष्टिकोण से यह ग्रंथ जीवन के आध्यात्मिक और साहित्यिक दोनों आयामों का अनोखा संगम है।
महात्मा गांधी ने भी रामचरितमानस की महिमा को हृदय से स्वीकारा। उन्होंने इसे अपनी ‘खुराक’ कहा। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इसकी भाषा इतनी मधुर और सरल है कि वे इससे कभी ऊबते नहीं। जेल के कठिन समय में भी वे मानस का पाठ करते थे और उससे ऊर्जा पाते थे। गांधीजी ने यह भी कहा कि रामचरितमानस के कारण लाखों लोग, जो पहले ईश्वर से विमुख थे, प्रभु-भक्त बन गए। आज भी यह परिवर्तनकारी प्रभाव जारी है। इस ग्रंथ का प्रत्येक पन्ना भक्ति और प्रेम से ओतप्रोत है। उनके अनुसार रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि अनुभवजन्य ज्ञान का भंडार है, जो साधक को आचरण, सेवा और करुणा का मार्ग दिखाता है। इस प्रकार, विनोबा भावे और महात्मा गांधी की दृष्टि से रामचरितमानस धर्म और साहित्य दोनों का अद्भुत संगम है, जो मनुष्य को आत्मिक शांति, भक्ति और जीवन के उच्चतम मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
संबंध विच्छेद मेरे विचार में जिन पति-पत्नी के बीच संबंध विच्छेद होता है, उन्हें कभी हिकारत की नजरों से नहीं देखना चाहिए। एक सत्य घटना इसका उदाहरण है। गांधीयुग में एक बहुत बड़े लेखक हुए। उनका नाम जॉन गुंथर था। उन्होंने खूब लिखा और पत्रकार व लेखक के रूप में पूरी दुनिया का भ्रमण किया। उनकी किताबों की सूची कुछ इस प्रकार है: इनसाइड यूरोप, इनसाइड यूएसए, इनसाइड रशिया, इनसाइड अफ्रीका, इनसाइड एशिया आदि। उनका एक बेटा था, जो बहुत बीमार था।
अपने प्यारे बेटे के इलाज के दौरान तलाकशुदा पति-पत्नी एक बार फिर करीब आए और समझौता कर लिया। बेटे की इस दुनिया से विदाई के बाद जॉन ने एक किताब लिखी- ‘डैथ बी नॉट प्राउड’। किताब के अंतिम पन्नों में बच्चे की मां ने भी कुछ लिखा है, जिसमें उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की। उनके शब्द इस प्रकार हैं: आपकी संतान / शारीरिक रूप से दिव्यांग हो / या फिर बीमार हो / या पागल-गुस्सैल हो / पर एक बात कभी नहीं भूलना / वह जीवित तो है ना! इस तरह के प्राणवान शब्दों के साथ किताब खत्म होती है। इसे पढ़कर हमारी आंखें सजल हो जाती हैं। ऐसे संबंध विच्छेद में भी सभ्यता और भद्रता के लक्षण पाए जाते हैं। जब दो लोग पूरी समझदारी से अलग होते हैं तो उनकी निंदा न करें और न ही उन्हें ताने मारें। न चाहते हुए भी साथ रहने में कोई सभ्यता नहीं है। द्वेषरहित और कटुतारहित संबंध विच्छेद, सभ्यता की निशानी है। इसे समझने के लिए लंबा जीवन जीना और गहन अध्ययन करना पड़ता है। जॉन गंुथर की यह किताब लंबी नहीं है और महंगी भी नहीं। ऐसी किताब खरीदकर हम संस्कार नाम के गहनों की खरीददारी कर रहे होते हैं।
आंसुओं से श्रद्धांजलि हमारे समाज में भांजे का बड़ा महत्व है। कहा गया है कि एक भांजे को भोजन कराने से 100 ब्राह्मणों को भोजन कराने का पुण्य मिलता है। एक बार मैंने पुज्य रविशंकर महाराज से बातचीत में बताया कि जब मेरा वेतन मात्र 200 रुपए था, तब मैंने अपने एक भांजे की परवरिश की थी। वह भांजा बड़ा होकर एक कुशल आर्थोपेडिक सर्जन बन गया। गरीबों के लिए वह डॉक्टर नहीं, बल्कि मसीहा था। गरीबों से वह अपनी फीस कभी नहीं लेता। पर छोटी उम्र में ही उसने दुनिया छोड़ दी। तब उसका अपना गांव रांदेर आंसुओं के सैलाब में डूब गया। जिन गरीबों का उसने इलाज किया था, वे सभी रो रहे थे। ये आंसू उसके सद्कर्मों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थे।








