रसरंग में चिंतन:  स्वतंत्रता के साथ लिए गए निर्णय भी हमारे होते हैं?
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रसरंग में चिंतन: स्वतंत्रता के साथ लिए गए निर्णय भी हमारे होते हैं?

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अस्तित्ववादी दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्र हमेशा चयन यानी चॉइस पर जोर देते थे। उनका सवाल था कि जीवन में असली महत्व किसका है – चयन का या चयनहीनता का? हालात के दलदल में फंसे मनुष्य के पास आखिर कौन सी वास्तविक पसंद बचती है? अक्सर मनुष्य परिस्थितियों के षड्यंत्र की कठपुतली बन जाता है। वह रस्सी पर अपने करतब दिखाता तो है, लेकिन उसे नचाने वाला कोई और होता है। कभी-कभी जीवन एक विराट विवशता जैसा लगता है। अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता मनुष्य का सपना है, जबकि विवशता कठोर यथार्थ। मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर की किताब ‘बियांड फ्रीडम एंड डिग्निटी’ जब प्रकाशित हुई, तब अमेरिका में कई लोगों ने उन्हें रूस समर्थक मानकर उनकी आलोचना की। उस किताब का सार एक ही वाक्य में कहा जा सकता है – मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की बातें करने वाले मनुष्य के हाथ में वास्तव में कुछ नहीं होता। प्रसंग सामने आया है, तो यह भी याद रखना चाहिए कि इस मनोवैज्ञानिक ने एक उपन्यास भी लिखा था – वाल्डेन टू। इसका शीर्षक हेनरी डेविड थोरो की किताब ‘वाल्डेन’ से प्रेरित है। थोरो के प्रशंसकों को यह पुस्तक रोचक लगेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। विवशता जो टालने से भी नहीं टले:
अब फिर उसी विवशता की बात पर आएं। यह विवशता ऐसी है, जो टालने से भी नहीं टलती। न तो मौत टलती है और न ही लाचारी। मौत स्वयं मनुष्य पर थोपी गई एक भयंकर विवशता है। संत कवि नरसी मेहता का कथन मानवीय लाचारी को एक ऊंचा अर्थ देता है, इसलिए वह सांत्वना भी देता है- हम जैसा सोचते हैं, वैसा सब घटित नहीं होता / फिर भी एक बेचैनी मन में बनी रहती है। यदि सब कुछ मनुष्य के बस में होता / तो कोई दुखी नहीं रहता। शत्रु को मारकर सबको मित्र बना लेते। गीता के अठारहवें अध्याय के अंत में प्रकट होने वाली शरणागति और इस्लाम के हृदय में निहित समर्पण, दोनों ही इस विराट मानवीय विवशता से जन्मी एक गहरी बुद्धिमत्ता की धार्मिक अभिव्यक्ति हैं। बात का सार यही है – मनुष्य के सामने प्रकट होने वाली चयनहीनता। हर परिस्थिति में केवल एक ही निर्णय :
स्वभाव से दार्शनिक लेखक मिलान कुंदेरा की एक प्रसिद्ध पुस्तक है – द अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग। उपन्यास के क्षेत्र में उन्होंने नई सृजनात्मकता का मार्ग खोला। उनकी रचनाएं दर्शन का भारी ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का संवेदनशील आख्यान हैं। 1929 में चेकोस्लोवाकिया में जन्मे कुंदेरा का पहला उपन्यास ‘द जोक’ था। 1968 की वसंत ऋतु में जब प्राग की सड़कों पर रूसी टैंक घूम रहे थे और स्वतंत्रता आंदोलन पर क्रूर दमन चल रहा था, तब इस उपन्यास ने इतिहास रच दिया। 1975 के बाद कुंदेरा फ्रांस जाकर बस गए।
अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग में वे लिखते हैं – मनुष्य को जीवन केवल एक बार मिलता है। इसलिए यह तय करना कठिन है कि हमारा कौन सा निर्णय अच्छा था और कौन सा बुरा। क्योंकि हर परिस्थिति में हम केवल एक ही निर्णय ले सकते हैं। अलग-अलग निर्णयों की तुलना करने के लिए हमें दूसरी, तीसरी या चौथी जिंदगी नहीं मिलती। इस नजरिए से व्यक्ति का जीवन और इतिहास दोनों ही समान हैं। कुंदेरा कहते हैं कि निर्णयों की तुलना असंभव है। यह बात सही है, लेकिन मूल प्रश्न कुछ और है। हम जो निर्णय स्वतंत्र होकर लेते हैं, क्या वे सचमुच हमारे अपने होते हैं? जब जीवन की धारा और उसके भंवर पर हमारा कोई नियंत्रण ही नहीं होता, तब किसी टापू पर खड़े होकर लिया गया निर्णय भी वास्तव में हमारा नहीं होता। वह हमारे चारों ओर घूमती परिस्थितियों से पैदा हुआ निर्णय होता है। हम निर्णय नहीं लेते, निर्णय हमसे लिया जाता है।
संसार में धर्म से बड़ी सांत्वना कोई नहीं!
इस संसार में धर्म से बड़ा सांत्वना स्रोत ढूंढना कठिन है। भगवान से बड़ा ट्रैंक्विलाइजर अभी तक मनुष्य को नहीं मिला। जैसे रोगी को दिलासा देने के लिए डॉक्टर तरह-तरह की गोलियां देता है, वैसे ही धर्मगुरु सदियों से मनुष्य को आश्वासन की गोलियां देते आए हैं। भगवान के होने का भ्रम भले ही भ्रम हो, लेकिन उसे पूरी तरह तोड़ देना भी जोखिम भरा है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या जैन मंदिर, यदि कोई उन्हें सांत्वना क्लिनिक कहे, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मानवीय विवशता शार्क मछली के जबड़ों जितनी ही भयावह है। फिर भी मनुष्य जीना चाहता है और जीते रहने के लिए प्रयत्न करने की स्वतंत्रता उसके पास अभी भी बची हुई है इन बातों को पढ़कर सिर चकरा सकता है। मलेशिया के पेनांग से कुछ ही दूरी पर एक अनोखा उद्यान है, जहां केवल तितलियों का संसार है। विशेष वातावरण में हजारों तितलियों का पालन किया जाता है। दुनिया का यह पहला ऐसा उद्यान है। इस उद्यान में कोई व्यक्ति अकेला चला जाए, तो यह शोभा नहीं देता। इस उपवन में प्रवेश करने के बाद लिए जाने वाले निर्णय, चयन, चयनहीनता और लाचारी जैसे शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। तब केवल एक ही चीज बचती है- हमारे होने का असह्य हलकापन। कुंदेरा इस हलकेपन को असह्य क्यों कहते हैं? शायद इसलिए कि जब भारीपन की आदत छूट जाती है, तब हलकापन भी असहनीय लगने लगता है।



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