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सभी जानते हैं कि राम राज्य का उद्भव त्रेतायुग में हुआ। यह वह युग था, जिसमें धर्म का वृषभ तीन पैरों पर खड़ा था और धर्म की रक्षा के लिए विष्णु धरती पर श्रीराम के रूप में अवतरित हुए थे। इसके बाद द्वापरयुग आया, जिसमें धर्म का वृषभ दो पैरों पर खड़ा था और विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए। इस युग में कंस के मथुरा पर राज करने का उल्लेख मिलता है। इन दो युगों के दो राज्यों में से केवल अयोध्या के राम राज्य को धार्मिक माना जाता है। मथुरा में कंस के राज्य की शायद ही चर्चा होती है। आइए, आज के लेख में राम राज्य और कंस राज्य के माध्यम से धर्म की धारणा को गहराई से समझते हैं। पुराणों में दो तरह के राजाओं का वर्णन मिलता है। एक वे जो धर्म का पालन करते हैं और दूसरे वे जो धर्म का पालन नहीं करते। जो राजा धर्म के अनुसार नहीं चलते, वे सत्ता में बने रहने के लिए अपनी प्रजा पर अत्याचार करने से भी नहीं हिचकते। कंस इसी तरह का एक राजा था। वह जानता था कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इसलिए, उसने उस शिशु को जन्म लेते ही मारने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहा। जब उसे पता चला कि वह शिशु अब ग्वालों के बीच पल रहा है, तो उसने पूतना नामक राक्षसी को उसे मारने के लिए भेजा। लेकिन पूतना भी असफल रही और वह बालक कृष्ण के हाथों मारी गई। जैसे-जैसे बालक कृष्ण बड़े होते गए, कंस ने कई बार उनका वध करने का प्रयास किया, लेकिन उसके सभी प्रयास असफल रहे। कृष्ण के पराक्रम की खबरों से कंस डर गया। उसे पता चला कि कृष्ण ने कई असुरों और नागों का वध किया था और गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रज के लोगों को मूसलाधार वर्षा से बचाया था। अंत में, कंस ने कृष्ण और बलराम को मारने के उद्देश्य से उन्हें मथुरा में आयोजित मल्लयुद्ध प्रतियोगिता में आमंत्रित किया। रास्ते में उसने दोनों भाइयों पर कुवलयापीड़ नामक मदमस्त हाथी छोड़ दिया। लेकिन दोनों भाइयों ने मिलकर उस हाथी का वध कर दिया। इसके बाद मल्लयुद्ध के अखाड़े में कृष्ण और बलराम ने चाणूर और मुष्टिक नामक योद्धाओं को पराजित किया। अंत में, कृष्ण ने कंस का वध कर दिया।
कंस की मथुरा के विपरीत राम की अयोध्या में धर्म का पालन होता था। इसलिए, अयोध्या के निवासी सुखी और समृद्ध थे। राम राज्य के संदर्भ में हमें यह याद रखना होगा कि राम के पुत्र लव और कुश राजमहल में नहीं, बल्कि वन में अपनी मां के साथ बड़े हुए। अयोध्या में आयोजित अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा जब वन में उनके पास पहुंचा, तो उन्होंने उसे पकड़ लिया और दावा किया कि वन का वह क्षेत्र उनका है। अर्थात, उस पर राम का अधिकार नहीं था। इस तरह, उन्होंने अपने ही पिता के विरुद्ध युद्ध किया। ऐसी ही एक कहानी महाभारत में भी मिलती है। पांडवों ने जब अश्वमेध यज्ञ किया, तो उनका घोड़ा मणिपुर पहुंचा। वहां के राजा बभ्रुवाहन ने उसे रोककर पकड़ लिया। इसके बाद बभ्रुवाहन और अर्जुन के बीच युद्ध हुआ। उस समय बभ्रुवाहन यह नहीं जानता था कि अर्जुन उसके पिता हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि रामायण और महाभारत यह नहीं सिखाते कि बच्चों को बड़ों का विवेकहीन ढंग से आदर करना चाहिए। इन महाकाव्यों में पिता और पुत्र के बीच भी युद्ध होता है। इसी तरह, हम देखते हैं कि भीष्म पितामह, द्रोण और मामा शल्य पराजित होते हैं। यहां उम्र नहीं, बल्कि धर्म तय करता है कि विजयी कौन होगा। कंस के उम्रदराज होने के बावजूद कृष्ण ने उसका वध किया, क्योंकि वह अधर्म कर रहा था। धर्म का तात्पर्य आत्मज्ञान के अनुरूप सांसारिक जीवन जीने से है। आत्मज्ञान हमें सबका आदर करते हुए न्यायपूर्ण जीवन जीना सिखाता है, जिसमें हम किसी के प्रति पक्षपात नहीं करते। जब धर्म की धारणा राजाओं पर लागू होती है, तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समझें कि उनके लिए प्रजा अपने परिवार से अधिक महत्वपूर्ण है। अर्थात, राजधर्म कुलधर्म से श्रेष्ठ है। भगवद्गीता में भी यही सीख दी गई है। यही कारण है कि राम ने सीता को फिर से वन में रहने के लिए भेज दिया, जबकि राम जानते थे कि वह निर्दोष थीं। लेकिन आज इसके विपरीत हो रहा है। कुलधर्म और निष्ठा को श्रेष्ठ माना जाता है, जिसके कारण समाज में पक्षपात बढ़ रहा है। इन कहानियों से युवा पीढ़ी अपने जीवन में धर्म संकट से बाहर निकलने का रास्ता सीख सकती है। अन्यथा, वह यही मानती रहेगी कि बड़ों का विवेकहीन ढंग से आदर करना ही सनातन धर्म है। इस गलत सोच को बदलने का समय अब आ गया है।
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