रीता कोठारी का कॉलम:  अपने अनुभवों के लिए हमारे पास क्या हमेशा शब्द होते हैं?
टिपण्णी

रीता कोठारी का कॉलम: अपने अनुभवों के लिए हमारे पास क्या हमेशा शब्द होते हैं?

Spread the love




कई साल पहले मैं अपनी चाची को एक प्रख्यात होम्योपैथ के पास ले गई थी। जैसा कि होम्योपैथी में अकसर होता है, मेरी चाची से कई सवाल पूछे गए- आप कहां रहती हो, घर में कौन-कौन है, आप को चिंता करने की आदत है, आप गुस्से में आ जाती हो या नहीं? मेरे परिवार के बड़े सदस्य पढ़े-लिखे लोगों में से नहीं हैं। मेरी चाची मुश्किल से अपना नाम लिख पाती हैं। 12 साल की उम्र में उनकी शादी हो चुकी थी और उनके 11 बच्चे हुए थे। उनसे डाक्टर ने पूछा, ‘आप कहां बड़ी हुईं, आपकी पैदाइश कहां की है?’ चाची ने कहा, ‘सिंध में पैदा हुई और फिर हमारे परिवार वाले अजमेर चले गए। शादी के बाद से अहमदाबाद में हूं।’ ‘सिंध से अजमेर कैसे आना हुआ?’ पूछे जाने पर चाची ने कहा- ‘जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान हुआ!’ गुजरात में बसने वाले डाक्टर को समझ न आया। उसने कहा किस साल में? चाची ने कहा, ‘वह तो मैं नहीं जानती!’ बंटवारा हमारे घर की वास्तविकता थी, किंतु यह शब्द हमारे लिए अनजाना था। ‘जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान हुआ’- इस वाक्य को कई तरह से समझा जा सकता है। जो हिंदुस्तान था वह पाकिस्तान बन गया या दोनों शब्दों के बीच लीक लगाकर कहो तो जब दो देश बने- हिंदुस्तान और पाकिस्तान। मैं इस बातचीत को नहीं भूल पाई। पहली बार मुझे एहसास हुआ, जो इतनी भयानक ऐतिहासिक घटना से गुजरते हैं, उनके लिए उनकी तारीख और नाम महत्वपूर्ण नहीं भी हो सकते हैं। सिंधी समाज में ‘विर्हांगो’ शब्द का भी इस्तेमाल होता है, परंतु यह साहित्यकारों द्वारा प्रयोग किया जाता है। मेरी चाची जैसे लोगों को यह शब्द भी पता नहीं था, ना ही 1947 का साल। शायद इतिहास और स्मृति का यही रिश्ता है। एक घटनाओं को नाम देता है और दूसरी बेनाम घटनाओं का असर छोड़ जाती है। अगले वर्षों में मैंने विभाजन के बाद सिंध से पलायन करने वाले लोगों का साक्षात्कार लेना शुरू किया। मैं अपनी चाची से भी उनके अनुभव के बारे में जानना चाहती थी। उन्होंने मुझे बताया कि वे अपने परिवार के साथ हैदराबाद (सिंध) गई थीं और वहां से उन्होंने ट्रेन से राजस्थान के पाली तक का सफर तय किया। जब भी कोई टिकट चेक करने आता, उन्हें कहीं छिपा दिया जाता क्योंकि उनके पास टिकट नहीं था। इससे पहले कि वे मुझे और कुछ बता पातीं, उनके पति यानी मेरे चाचा ने उन्हें बीच में ही रोक दिया और कहा, तुम्हें कुछ नहीं पता, मुझे बताने दो कि क्या हुआ था। चाचा को घटनाओं के नाम, आरएसएस, मुस्लिम लीग और कांग्रेस जैसे संगठनों के नाम अच्छी तरह से पता थे। वे खुद को इतिहास का जानकार मानते थे। लोगों से भरे घर में चाची और मुझे कभी अकेले बात करने का समय नहीं मिला। उनकी कहानी दबी रह गई। जिनके पास अनुभव हैं, उनके पास कई बार इतिहास में इस्तेमाल होने वाले शब्द नहीं होते। अपने अनुभवों को वे जिन शब्दों में या कई बार आधे-अधूरे वाक्यों में कहते हैं, उन्हें सुनने का वक्त और धीरज हम में नहीं होता। क्या ट्रॉमा या सदमे के अनुभवों के शब्द हमेशा होते हैं? और ऐसे कौन-से शब्द हैं, जो उस अनुभव से न्याय कर सकें? यह तो हुई इंसानों की बातें, जानवरों को क्या होता है? सिंधी में ‘बैल’ नाम की एक कहानी है, जिसका मैंने अनुवाद किया है। बंटवारे के बाद पंजाब से आए कुछ किसान सिंध के गांवों में पहुंचते हैं। उनमे से एक शम्सुद्दीन नाम का किसान अपने बैल वहां के एक सिंधी किसान को दे देता है और उससे दूसरे बैल और गधे ले लेता है। लेकिन दोनों किसान अपने बैलों को हुक्म देते हुए पाते हैं कि बैलों को उनकी भाषा ही समझ नहीं आती। आखिरकार, हारकर दोनों अपने-अपने जानवर लौटा देते हैं। कहानी के अंत में सिंध का किसान सोचता है कि अगर ये हालत बैलों की है तो यहां से गए सिंधी भाइयों की क्या हालत हुई होगी? शब्द और अनुभव एक-दूसरे के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। यह माना जाता है कि इतिहास सभी के बारे में होता है, लेकिन अकसर यह उन्हीं के बारे में होता है, जिनके पास उसे व्यक्त करने के लिए शब्द होते हैं। यह विडम्बना ही है कि विभाजन जैसी विनाशकारी घटना के लिए बंटवारा जैसा शब्द है, जिसका सीधा अर्थ है- बांटना या साझा करना। हम इस अनुभव के लिए तैयार नहीं थे, हमारी भाषा में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं था। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *