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गणेश चतुर्थी की पूर्व संध्या पर जब पूरे गोवा में घरों की सफाई हो रही थी, दीये जलाए जा रहे थे और परिवार भगवान गणेश के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, तब 65 साल के अशोक परनेम में कासरवर्ने के देउलवाड़ा वार्ड में एक छोटे-से घर में बीमार पड़े थे। 20 वर्गमीटर का यह छोटा-सा घर उनकी दो विधवा बहनों के बड़े मकानों के बीच बाद में बनाया गया था। दोनों बहनें दो हजार रुपए महीने की सरकारी मदद पर गुजारा करती थीं और बारी-बारी से अशोक की देखभाल करती थीं। कभी अशोक एक होटल में कार्यरत थे और जो भी छोटा-मोटा काम मिलता, कर लेते थे। फिर दो साल पहले उनका एक पैर काटना पड़ा। काम छूट गया। जिंदगी सिमटती चली गई। वे बैसाखियों के सहारे थोड़ा-सा चलते हुए बहनों के घर जाते और वापस उस ठिकाने पर आ जाते, जिसे वे अपना कहते थे। जब मैंने उनकी कहानी पढ़ी तो भीतर तक हिल गया। आखिर क्यों, आगे पढ़िए। 13 सितंबर को अशोक गंभीर बीमार पड़ गए। मुफ्त 108 एंबुलेंस से उन्हें समीप के हेल्थ सेंटर लाया गया, जहां उन्हें ‘ब्रॉट डेड’ घोषित कर दिया गया। सरकार के लिए उनकी मौत एक संख्या थी। लेकिन दोनों बहनों के लिए यह उनके छोटे-से परिवार के आखिरी पुरुष की मौत थी। उन्होंने सुना था कि गरीब लोगों का अंतिम संस्कार परनेम के नगरपालिका के श्मशान घाट में मुफ्त किया जा सकता है। इसलिए उन्हें इस पर भरोसा था। दोनों ने पैसे मिला कर एक वाहन किराए पर किया और भाई के शव को वहां ले गईं। कल्पना कीजिए उस सफर की- दो गरीब विधवाएं इस उम्मीद में अपने भाई के शव के साथ बैठी थीं कि कहीं किसी सरकारी इमारत में गरीब आदमी को अंतिम विदाई देने की जगह जरूर होगी। वे शाम को श्मशान घाट पहुंचीं। वह खाली था, कोई अटेंडेंट भी नहीं और ऐसा भी कोई नहीं, जिससे कुछ पूछा जा सके। और फिर उन्हें पता चला कि उनके पास क्या नहीं था- जलाने के लिए लकड़ी। उनके पास लकड़ी खरीदने के पैसे नहीं थे। न ही वे अशोक के शव को वापस ले जाने का खर्च उठा सकती थीं। और इसीलिए, उस रात दोनों बहनों को कुछ ऐसा करना पड़ा, जो किसी बहन को कभी नहीं करना चाहिए। वे भाई का शव वहीं छोड़कर चली गईं। इसलिए नहीं कि उन्हें उनसे प्यार नहीं था। शायद इसलिए कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा था। वे उनके बिना घर लौट गईं। अगली सुबह पुलिस को श्मशान में एक सड़ता हुआ शव मिला। कुछ समय तक वह शव अज्ञात था। लेकिन पुलिस सब-इंस्पेक्टर आदित्य गड तलाश करते रहे। आखिरकार वे 20 वर्गमीटर के उस छोटे-से घर तक पहुंच गए, जो अशोक का था। उनकी दो बहनें थीं। कभी उनके पास नौकरी थी। कभी वह दो पैरों पर चलते थे। वह एक घर में रहते थे, जिसे उनके भाई ने बनाया था। उनका भाई माइन्स में ट्रक ड्राइवर था और घर बनाने के कुछ समय बाद वह भी चल बसे थे। इसके बाद परिवार गरीबी में चला गया। और अब अशोक भी नहीं रहे। पुलिस ने बिना पोस्टमार्टम के अशोक का शव परिवार को सौंप दिया। रिश्तेदारों ने मिलकर पैसे जुटाए और इस बार उन्होंने वो चीज खरीद ली, जो अशोक का परिवार नहीं खरीद पाया- लकड़ी। आखिरकार, अशोक का अंतिम संस्कार हो गया। लेकिन मैं उस रात के बारे में सोचता रहता हूं, जब दोनों बहनें अपने भाई के बिना घर लौट रही थीं। वे जरूर उस चीज के बारे में सोच रही होंगी, जिसका हिसाब कभी किसी परिवार को नहीं लगाना चाहिए- किसी को अंतिम विदाई देने में आखिर कितना खर्च आता है? अशोक की बहनों ने उसे नहीं छोड़ा था, बल्कि गरीबी ने पहले ही उन्हें इस हाल में लाकर छोड़ दिया था। अशोक जैसे भी लोग हैं, जिन्हें हमसे बहुत थोड़ा-सा चाहिए। न घर। न नौकरी। यहां तक कि खाना भी नहीं। बस इतनी लकड़ी कि वे इस दुनिया से सम्मान के साथ विदा हो सकें। यह लिखते हुए मैं अपने कंप्यूटर की स्क्रीन नहीं देख पा रहा हूं, क्योंकि आंखें सजल थीं। फंडा यह है कि कोई समाज वास्तव में तब तक समृद्ध नहीं है, जब तक उसके सबसे गरीब लोग सम्मानजनक अंतिम विदाई देने का खर्च भी न उठा सकें।
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