- Hindi News
- Opinion
- N Raghuraman Column | Healthy Diet Tips For Aging Over Single Best Diet
8 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
कुछ महीने पहले मेरे ब्लड टेस्ट में थोड़ी गड़बड़ी आने के बाद अस्पताल में एक ‘ज्ञानी’ ने मुझसे यह कहा कि ‘चूंकि आप साउथ इंडियन हैं तो आप लोग खूब चावल खाते होंगे। अगर आप गेहूं खाना शुरू कर दें तो आपकी मेडिकल प्रॉब्लम्स लगभग खत्म हो जाएंगी।’
उन्होंने बताया कि गेहूं खाना शुरू करने के बाद उनकी हालत में सुधार आया है। मैंने बस उन्हें थैंक्स कहा और अपनी रिपोर्ट लेकर वहां से निकल गया। इसके बाद मुझे हेल्दी ईटिंग प्लान के कम से कम दो दर्जन सुझाव मिल चुके हैं।
इनमें से प्रत्येक में प्रमुखता से बताई गई खाने की चीजों को लेकर थोड़ा-बहुत फर्क था। यह बात किसी को सोचने पर मजबूर करती है कि बात जब हेल्दी एजिंग की आए तो क्या इनमें से कोई एक चीज दूसरे से बेहतर चॉइस है।
इन सभी सलाहों को परखने की मेरी खोज 29 अगस्त को यूके के एक साइंटिफिक जर्नल ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित हालिया स्टडी पर जाकर खत्म हुई। जर्मन रिसर्चर्स की स्टडी में औसतन 56 साल उम्र वाले 7500 वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया गया।
उन पर 10 अलग-अलग हेल्दी डाइटरी पैटर्न का परीक्षण किया गया। भले ही अलग-अलग डाइट ने डीएनए पर बिल्कुल अलग तरह के केमिकल ‘फिंगरप्रिंट’ छोड़े, लेकिन अंतत: इन सभी ने उन्हीं सेलुलर पाथ-वे को एक्टिव किया, जो इन्फ्लेमेशन कम करने और मेटाबॉलिज्म को प्रोटेक्ट करने से जुड़े थे।
‘हेल्दी डाइटरी पैटर्न’ में अलग-अलग होने के बावजूद इन सभी ने उन्हीं बायोलॉजिकल पाथ-वे को प्रभावित किया, जो इस बात से संबंधित थे कि कोशिकाएं एक-दूसरे से कैसे कम्युनिकेट करती हैं, बढ़ती हैं, काम करती हैं और खुद को मेन्टेन रखती हैं।
रिसर्चर्स ने पाया कि किसी भी हेल्दी ईटिंग पैटर्न को अपनाने का संबंध बायोलॉजिकल एजिंग की रफ्तार को कम करने से था। इसके उलट, रिसर्च यह भी कहती है कि अनहेल्दी और इन्फ्लेमेटरी डाइटरी पैटर्न को ज्यादा अपनाना बायोलॉजिकल एजिंग को तेज करने से जुड़ा था।
इस रिसर्च पेपर का निष्कर्ष यह है कि बेहतर तरीके से खाने का सिर्फ एक ही सबसे अच्छा तरीका नहीं है। ऐसा लगता है कि कई सारे हेल्दी पैटर्न हैं, जो खाने के अलग-अलग कॉम्बिनेशन पर जोर देते हैं और हेल्दी एजिंग को सपोर्ट करते हैं।
इस विस्तृत रिसर्च ने मेरा ध्यान इसलिए खींचा, क्योंकि मेरे घर में इसके दो जीते-जागते उदाहरण हैं। मेरे दो पेट्स- चीकू और चिनी। पहली जहां ‘खाने के लिए जीती है’, वहीं दूसरी ‘जीने के लिए खाती है।’ दोनों एक ही मां की संतान हैं और 15वें साल में हैं।
अब सवाल यह है कि एक ही मां से होने के बावजूद एक को खाना इतना पसंद क्यों है और दूसरी इतनी सावधानी से क्यों खाती है। प्रेग्नेंसी के दौरान इन दोनों की मां की देखभाल करने वाले पशु चिकित्सक के मुताबिक चिनी सबसे पहले पैदा हुई थी और गर्भ में रहते हुए उसे भोजन पाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी।
वहीं चीकू उसी मां की छठी संतान थी और उसे अपने हिस्से का खाना पाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मेरे घर पर वह हमेशा खाने के लिए लड़ती रहती है। आज 15 साल बाद चिनी की तुलना में चीकू को डायबिटीज समेत कई स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जबकि चिनी शायद ही कभी किसी पशु चिकित्सक के पास जाती है। लगता है कि ‘हम जैसा खाते हैं, वैसे ही बनते हैं’ वाला नियम सभी जीवों पर लागू होता है।
व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए इसका मतलब है कि मुझे खाने, काम करने और जीने का वही तरीका अपनाना चाहिए, जो मेरे नानाजी ने 96 साल की उम्र तक अपनाया- जब तक कि बाथरूम में फिसलने से उनका स्वर्गवास नहीं हो गया। हमारी फूड हैबिट्स भी वैसी होनी चाहिए, जैसे हमारे पैरेंट्स और पूर्वज खाते थे।
और वर्क-आउट का तरीका भी उनके जैसा ही होना चाहिए। मसलन, 80 की उम्र में भी कुएं से पानी खींचकर अपने कपड़े धोना। चूंकि हमें उनका डीएनए विरासत में मिला है तो मेरा मानना है कि जितना हो सके हमें उनकी जीवनशैली के करीब रहने की कोशिश करनी चाहिए। आप क्या सोचते हैं, प्लीज मुझे लिखिएगा।
फंडा यह है कि इस बारे में कोई मैजिक फॉर्मूला नहीं है। फ्लेक्सिबिलिटी और लॉन्जेबिटी के लिए समान बात यह है कि होल-फूड्स, हेल्दी फैट्स और प्लांट्स से मिला फूड खाएं। ‘प्रोसेस्ड फूड्स’ और ‘एडेड शुगर’ से दूरी रखें। जब तक आप हेल्दी खाना खाते रहेंगे, आप ऐसी जीवनशैली चुन सकते हैं, जो आपके पर्सनल टेस्ट और ट्रेडिशन के लिहाज से फिट बैठती हो।








