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डिजिटल दौर में स्मार्टफोन और टैबलेट का बढ़ता इस्तेमाल छोटे बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। पीजीआई चंडीगढ़ की पीडियाट्रिक्स और सोशल पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट की प्रोफेसर भवनीत भारती और उनकी टीम की नई रिसर्च के मुताबिक करीब 68% बच्चे 18 महीने की उम्र से पहले ही स्क्रीन के संपर्क में आ चुके हैं। यह स्टडी प्रतिष्ठित इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित हुई है। रिसर्च में 18 से 24 महीने के छोटे बच्चों को शामिल किया गया। इसमें सामने आया कि स्क्रीन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की सीखने और दूसरों से बातचीत करने की क्षमता को धीमा कर रहा है। साथ ही मोबाइल देखते हुए खाना खाने की गलत आदत भाषा और ध्यान लगाने की क्षमता पर भी गहरा असर डाल रही है। 10 हफ्ते का प्रोजेक्ट: स्क्रीन टाइम 73% घटा, खेल 20% बढ़ा डॉ. भवनीत के मुताबिक स्टडी के बाद पीजीआई चंडीगढ़ के एडवांस पीडियाट्रिक्स सेंटर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ नर्सिंग एजुकेशन के साथ मिलकर क्वालिटी इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट चलाया गया। इसमें 10 बिंदुओं वाला डे-टू-डे प्ले प्रोटोकॉल और ‘प्रिंसिपल ऑफ 5’ मॉडल लागू किया गया। वार्डों में सुबह-शाम दो-दो घंटे के प्ले सेशन रखे गए और खिलौनों की व्यवस्था की गई। 10 सप्ताह तक चले इस अभियान से बच्चों का स्क्रीन टाइम 73% तक घटा और खेल गतिविधियां 20% बढ़ीं। कविताएं और कहानियां बच्चों का डर कम करने में असरदार रहीं। पीजीआई के पीडियाट्रिक्स और सोशल पीडियाट्रिक्स विभाग के प्रो. भवनीत भारती का कहना है कि छोटे बच्चे निष्क्रिय होकर स्क्रीन देखने के बजाय अपने माता-पिता और आसपास के वातावरण से सीधे संवाद करके सबसे बेहतर सीखते हैं। बच्चों को स्क्रीन की नहीं, बल्कि साथ की, कहानियों की और खुले मैदानों में खेलने की जरूरत है। रिसर्च के आंकड़े: पर्सनल और सोशल ग्रोथ प्रभावित 33% बच्चे स्क्रीन पर आंकड़े बताते हैं कि लगभग 33% बच्चे वीकडेज में रोजाना एक घंटे से अधिक का समय स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। इस वजह से उनकी शारीरिक गतिविधियों पर असर देखा गया है। क्या असर हो रहा जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम एक घंटे से कम था, उनमें इंटरेक्शन करने और समस्या सुलझाने का स्किल कहीं बेहतर पाया गया। मोबाइल देखकर खाना खाने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
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