नंदितेश निलय का कॉलम:  हमारे प्रजातंत्र का अंतिम व्यक्ति 2 मिनट के विलम्ब से क्यों हारा?
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नंदितेश निलय का कॉलम: हमारे प्रजातंत्र का अंतिम व्यक्ति 2 मिनट के विलम्ब से क्यों हारा?

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रोजाना सिर्फ तीन सौ रुपये कमाने वाले पिता ने जब बेटी की आंखों में डॉक्टर बनने का ख्वाब देखा तो कर्ज लेने से नहीं चूके, लेकिन बेटी को नीट के परीक्षा केंद्र पर समय पर पहुंचाने से जरूर चूक गए। कुछेक रुपये कमाने वाले पिता ने सत्तर किलोमीटर की यात्रा बेटी के साथ तय तो कर ली पर वे दो मिनट लेट हो चुके थे। और इस तरह उस बेटी और पिता की सारी मिन्नतें, क्रंदन, रुदन अप्रासंगिक हो गए, क्योंकि परीक्षाएं नियम से चलती हैं। परीक्षा केंद्र के दरवाजे पर मौजूद संतरी को आदेश था कि नियत समय के एक मिनट बाद भी कोई परीक्षार्थी आता है तो वह लेट माना जाएगा और उसे प्रवेश नहीं मिलेगा। हताश पिता जमीन पर गिर चुके थे और बेटी उनसे लिपटकर रो रही थी। लेकिन संस्थाओं की दीवारें निस्तेज बस इस घड़ी की ओर इशारा कर रही थीं, यह कहते हुए कि आप लेट हैं, भले ही दो मिनट। पर एक मिनट का लेट भी लेट होता है। नहीं पता तो कभी जापान से पूछिए कि समय का महत्व क्या होता है। जापान में समय का अनुपालन उनकी संस्कृति का अहम हिस्सा है। वहां इसे जिकन-गेंशु यानी समय का सख्ती से पालन के नाम से जाना जाता है। समय पर रहना कोई नीरस जीवनशैली नहीं है, बल्कि यह सम्मान है उस हर व्यक्ति के लिए, जो आपका इंतजार कर रहा होता है। साथ ही यह दूसरों के लिए सोच और भरोसे से गहराई से जुड़ा है। जापान में समय पर होने का मतलब किसी के भी शेड्यूल का सम्मान करना है और यह उनकी हर संस्था और नागरिक-व्यवहार में देखा जा सकता है। रेलवे ऑपरेटर और सरकारी अधिकारी भी मामूली देरी के लिए भी औपचारिक रूप से सार्वजनिक माफी मांगते हैं। वहां के पब्लिक ट्रांसपोर्ट समय की पाबंदी के लिए जाने जाते हैं और अगर किसी कारणवश बस या ट्रेन कुछ मिनट लेट हो जाती है, तो स्टाफ एक आधिकारिक देरी का सर्टिफिकेट जारी करता है, ताकि यात्री इसे दफ्तर या स्कूल में दिखा सकें। लेकिन उस पिता के पास तो कोई सर्टिफिकेट नहीं था। सिर्फ एक मानवीय सत्य था कि बारिश के बावजूद वे समय पर पहुंचना चाह रहे थे, पर पहुंच नहीं सके। नियम के अनुसार तो वो लेट थे लेकिन परीक्षा केंद्र भी उनके प्रति संवेदना दिखाने में देरी कर गया। क्योंकि समय का अनुपालन एक विनम्र समाज बनाता है और उस संवेदना को सम्प्रेषित करने से नहीं चूकता। प्रजातंत्र का अंतिम व्यक्ति दो मिनट लेट से हार चुका था। इस घटना ने मुख्य रूप से दो प्रश्न खड़े किए? एक यह कि क्यों नहीं हमारे देश में समय का अनुपालन एक सामाजिक व्यवहार बन सकता है? और दूसरा, क्या किसी परिस्थिति में लेट का नियम लचीला हो सकता है? परीक्षा केंद्रों पर किसी खास परिस्थिति में एक-दो मिनट का लचीलापन क्या संभव नहीं? क्योंकि कोई परीक्षार्थी एक-दो मिनट के लेट को प्लान करके तो नहीं आना चाहेगा। और उससे भी बड़ी बात यह कि हम समय को लेकर क्या आदर का भाव रखते हैं? उसके प्रति कितनी प्रतिबद्धता रखना चाहते हैं? क्या देश में समय के प्रति ऐसी निष्ठा है? क्या समय की पाबंदी हमारी जीवनशैली का हिस्सा है? क्या मीटिंग्स समय पर शुरू होकर समय पर खत्म होती हैं? क्या किसी को इंतजार कराना हमें अपराधबोध से ग्रस्त करता है? या किसी के लिए समय पाबंद होता है और किसी के लिए लचीला? उस पिता और बेटी को यह यकीन था कि मनुष्य और मनुष्य की करुणा अभी बची हुई है। उनकी मिन्नतें सुन किसी का दिल जरूर पसीजेगा। लेकिन ऐसा ना हुआ और बेटी का एक साल बर्बाद हो गया। उसके एक साल पर वह दो मिनट का विलम्ब भारी पड़ गया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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