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6 घंटे पहले
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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार
हाल के वर्षों में राजनीति पर नजर डालें तो पता चलता है कई स्थापित क्षेत्रीय पार्टियां न केवल सत्ता से बाहर हो गईं, बल्कि उनमें से कुछ अस्तित्व का संकट भी झेल रही हैं। इसका प्रमुख कारण यह नहीं है कि ये जनाधार खो चुकी हैं।
इनके पतन का कारण पारिवारिक कलह और पार्टी सुप्रीमो के असमर्थ होने के बाद नेतृत्व परिवर्तन को सही तरीके से न संभाल पाना है। देखें तो इन तमाम दलों का जनाधार तो अब भी कायम है और उन्हें मिले वोट इसका प्रमाण हैं।
2009 के लोकसभा चुनाव में सभी क्षेत्रीय पार्टियों को 31.2% वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 35.8%, 2019 में 28.1% और 2024 में 33.5% रहा।
हाल ही में दिल्ली में ‘आप’ और पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने सत्ता गंवाई। इसके बावजूद ‘आप’ को 43.6% और टीएमसी को 40.8% वोट मिले।
बहुदलीय लोकतंत्र में यह वोट प्रतिशत अच्छे-खासे जनसमर्थन का संकेत है। लेकिन ये दल घटते जनसमर्थन के कारण नहीं, बल्कि अंदरूनी और बाहरी मसलों के चलते संकट झेल रहे हैं।
भारत की क्षेत्रीय पार्टियों ने ऐसे समय में राज्यों, जातियों और समुदायों को अपनी आवाज दी थी, जब राष्ट्रीय दल उन तक पहुंच बनाने में मशक्कत ही कर रहे थे। लेकिन इनमें से ज्यादातर पार्टियों की एक कमजोरी समान तौर पर सामने आई है। ये पार्टियां फैमिली बिजनेस की तरह चलाई जाती हैं और जब परिवार में झगड़ा होता है तो वे टूट भी जाती हैं।
देश में इसका लंबा इतिहास रहा है। 2010 में पंजाब के तत्कालीन वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल ने सार्वजनिक तौर पर अकाली दल की नीतियों से असहमति जताई और ‘पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब’ के नाम से अलग पार्टी बना ली। 2016 में इस पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया।
2005 में शिवसेना में भी फूट पड़ी और राज ठाकरे चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से अलग हो गए थे। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी दो गुटों में बंट गई थी।
दोनों गुटों ने पार्टी सिंबल पर दावा कर दिया। आखिरकार अखिलेश यादव ने पार्टी की कमान संभाली, जबकि उनके चाचा शिवपाल यादव ने अलग पार्टी बना ली।
हरियाणा में देवी लाल द्वारा स्थापित इंडियन नेशनल लोकदल भी 2018 में टूट गया। उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय सिंह ने अलग जननायक जनता पार्टी बना ली।
समय के साथ ये पारिवारिक झगड़े और खुलकर सामने आए हैं। 2020 में रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी लोक जनशक्ति पार्टी को भी ऐसा ही झटका लगा था।
2021 में पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस उनके बेटे चिराग पासवान की जगह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। उसी साल पारस ने अपना विरोधी धड़ा बनाने के लिए पार्टी के छह में से पांच सांसदों को तोड़ लिया और चिराग अपने ही पिता की बनाई पार्टी में लगभग अकेले पड़ गए।
महाराष्ट्र में इससे भी बड़े टकराव दिखे। शिवसेना के नाम, सिंबल और झंडे के लिए 2022 में एकनाथ शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे के गुट से संघर्ष किया और जीत भी हासिल की।
2023 में अजित पवार एनसीपी और पवार परिवार से अलग हुए और उनका गुट भी पार्टी का सिंबल और झंडा हासिल करने में सफल रहा। 2026 में बंगाल चुनाव में टीएमसी की हार के महीने भर में ही पार्टी ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के इर्द-गिर्द दो गुटों में बंट गई।
पार्टी कामकाज में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर पनपा असंतोष इसकी वजह बना। सबसे ताजा मामला बसपा का है, जिसमें मायावती अपने भतीजे आकाश को पार्टी में अहम जिम्मेदारी देती हैं और फिर पद से हटा भी देती हैं।
इन सभी घटनाओं की वजहों को समझना मुश्किल नहीं है। इन दलों में नेतृत्व चुनने की शायद ही कोई स्पष्ट व्यवस्था होती है। ऐसे में बेटे, भतीजे या भाई को शीर्ष पद पर बैठा दिया जाता है।
जब पार्टी का संस्थापक कमजोर पड़ता है या उसकी मृत्यु हो जाती है तो परिवार के कई सदस्यों को लगता है कि कुर्सी पर उनका भी अधिकार है। वफादारी पार्टी के प्रति नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के प्रति होती है। इसलिए जब परिवार बंटता है तो कार्यकर्ता भी बंट जाते हैं।
बहुतेरे क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व एक चीज पर टिका होता है- किसी एक नेता या परिवार के प्रति वोटरों का भरोसा। जब वही परिवार सार्वजनिक रूप से झगड़ता दिखता है तो यह भरोसा टूट जाता है। इस नुकसान की भरपाई मुश्किल होती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








